NitiN Raj SHARMA

Saturday, 25 April 2020

जब आप किसी को पसंद करने लगते हैं तब !


जब आप किसी को पसंद करने लगते हैं, तब आप उसकी सारी बुराई भूल जाते हो …
और जब आप किसी को नापसंद करने लगते हो, तो उसकी सारी खूबियां भूल जाते हो…

आज इंसान शांति पाने के लिए किसी भी तरह के प्रयास करने में हिचकता नहीं है, परंतु यह उसका दुर्भाग्य होता है की उसे शांति प्राप्त होती नहीं है।

कारण शांति पाने के लिए हमें धन – दौलत की नही अपितु दूसरों का सहयोग करने से वो भी निस्वार्थ भाव से करने से प्राप्त होती है।

एक वृद्ध संत ने अपनी अंतिम घडी नजदीक देख, अपने बच्चों को अपने पास बुलाया और कहा:-

मै तुम चारों बच्चों को एक एक कीमती रत्न दे रहा हूँ, मुझे पूर्ण विश्वास है की तुम इन्हें बहुत संभाल कर रखोगे और पूरी जिंदगी इनकी सहायता से अपना जीवन आनंदमय तथा श्रेष्ठ बनाओगे।

पहला रत्न है:-
“माफी”

तुम्हारे लिए कोई कुछ भी कहे तुम उसकी बात को कभी अपने मन में न बिठाना, और न ही उसके लिए कभी प्रतिकार की भावना मन में रखना, बल्कि उसे माफ़ कर देना।

दूसरा रत्न है:-
”भूल जाना”

अपने द्वारा दूसरों के प्रति किये गए उपकार को भूल जाना, कभी भी उस किये गए उपकार का प्रतिलाभ मिलने की उम्मीद मन में न रखना।

तीसरा रत्न है:-
”विश्वास”

हमेशा अपनी मेहनत और उस परमपिता परमात्मा पर अटूट विश्वास रखना क्योंकि हम कुछ नही कर सकते जब तक उस सृष्टि नियंता के विधान में नहीं लिखा होगा।
परमपिता परमात्मा पर रखा गया विश्वास ही तुम्हे जीवन के हर संकट से बचाएगा और सफल करेगा।

चौथा रत्न है:-
”वैराग्य”

हमेशा यह याद रखना की जब हमारा जन्म हुआ है तो निश्चित ही हमें एक दिन मरना ही है। इसलिए किसी के लिए अपने मन में लोभ– मोह न रखना।

तक तुम ये चार रत्न अपने पास सम्भाल कर रखोगे, तुम खुश और प्रसन्न रहोगे।


चिंतन के क्षण


स्वार्थी व्यक्ति यों किसी का कुछ प्रत्यक्ष बिगाड़ नहीं करता, किन्तु अपने लिए सम्बद्ध व्यक्तियों की सद्भावना खो बैठना एक ऐसा घाटा है, जिसके कारण उन सभी लाभों से वंचित होना पड़ता है जो सामाजिक जीवन में पारस्परिक स्नेह-सहयोग पर टिके हुए हैं।

ईश्वर को इस बात की इच्छा नहीं कि आप तिलक लगाते हैं या नहीं, पूजा-पत्री करते हैं या नहीं, भोग-आरती करते हैं या नहीं, क्योंकि उस सर्वशक्तिमान् प्रभु का कुछ भी काम इन सबके बिना रुका हुआ नहीं है। वह इन बातों से प्रसन्न नहीं होता, उसकी प्रसन्नता तब प्रस्फुटित होती है जब अपने पुत्रों को पराक्रमी, पुरुषार्थी, उन्नतिशील, विजयी, महान् वैभव युक्त, विद्वान्, गुणवान्, देखता है और अपनी रचना की सार्थकता अनुभव करता है।

आनंद का सबसे बड़ा शत्रु है- असंतोष। हम प्रगति के पथ पर उत्साहपूर्वक बढ़ें, परिपूर्ण पुरुषार्थ करें। आशापूर्ण सुंदर भविष्य की रचना के लिए संलग्न रहें, पर साथ ही यह भी ध्यान रखें कि असंतोष की आग में जलना छोड़ें। इस दावानल में आनंद ही नहीं, मानसिक संतुलन और सामर्थ्य का स्रोत भी समाप्त हो जाता है। असंतोष से प्रगति का पथ प्रशस्त नहीं, अवरुद्ध ही होता है।

किसी को यदि परोपकार द्वारा सुखी करते हैं और किसी को अपने क्रोध का लक्ष्य बनाते हैं, तो एक ओर का पुण्य दूसरी ओर के पाप से ऋण होकर शून्य रह जायेगा। गुण, कर्म, स्वभाव तीनों का सामंजस्य एवं अनुरूपता ही वह विशेषता है, जो जीवन जीने की कला में सहायक होती है।

ऐसे विश्वासों और सिद्धान्तों को अपनाइये जिनसे लोक कल्याण की दिशा में प्रगति होती हो। उन विश्वासों और सिद्धान्तों को हृदय के भीतरी कोने में गहराई तक उतार लीजिए। इतनी दृढ़ता से जमा लीजिए कि भ्रष्टाचार और प्रलोभन सामने उपस्थित होने पर भी आप उन पर दृढ़ रहें, परीक्षा देने एवं त्याग करने का अवसर आवे तब भी विचलित न हों। वे विश्वास श्रद्धास्पद होने चाहिए, प्राणों से अधिक प्यारे होने चाहिए।


यह संसार क्या है ?

यह संसार क्या है?


एक दिन एक शिष्य ने गुरु से पूछा, 'गुरुदेव, आपकी दृष्टि में यह संसार क्या है?


इस पर गुरु ने एक कथा सुनाई।


'एक नगर में एक शीशमहल था। महल की हरेक दीवार पर सैकड़ों शीशे जडे़ हुए थे। एक दिन एक गुस्सैल कुत्ता महल में घुस गया। महल के भीतर उसे सैकड़ों कुत्ते दिखे, जो नाराज और दुखी लग रहे थे। उन्हें देखकर वह उन पर भौंकने लगा। उसे सैकड़ों कुत्ते अपने ऊपर भौंकते दिखने लगे। वह डरकर वहां से भाग गया कुछ दूर जाकर उसने मन ही मन सोचा कि इससे बुरी कोई जगह नहीं हो सकती।


कुछ दिनों बाद एक अन्य कुत्ता शीशमहल पहुंचा। वह खुशमिजाज और जिंदादिल था। महल में घुसते ही उसे वहां सैकड़ों कुत्ते दुम हिलाकर स्वागत करते दिखे। उसका आत्मविश्वास बढ़ा और उसने खुश होकर सामने देखा तो उसे सैकड़ों कुत्ते खुशी जताते हुए नजर आए।


उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। जब वह महल से बाहर आया तो उसने महल को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ स्थान और वहां के अनुभव को अपने जीवन का सबसे बढ़िया अनुभव माना।  वहां फिर से आने के संकल्प के साथ वह वहां से रवाना हुआ।'


कथा समाप्त कर गुरु ने शिष्य से कहा..


'संसार भी ऐसा ही शीशमहल है जिसमें व्यक्ति अपने विचारों के अनुरूप ही प्रतिक्रिया पाता है। जो लोग संसार को आनंद का बाजार मानते हैं, वे यहां से हर प्रकार के सुख और आनंद के अनुभव लेकर जाते हैं।


जो लोग इसे दुखों का कारागार समझते हैं उनकी झोली में दुख और कटुता के सिवाय कुछ नहीं बचता.....।'

Tuesday, 17 March 2020

ज्ञान का संचय


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वे मनुष्य बड़े अभागे हैं जो विद्या पढ़ने से जी चुराते हैं। भिखारी को दाता के सामने जैसे तुच्छ बनना पड़ता है वैसे ही तुच्छ यदि तुम्हें शिक्षकों के सामने बनना पड़े तो भी शिक्षा प्राप्त करना ही कर्तव्य है। मनुष्य जाति के सच्चे नेत्रों के नाम हैं (1) अंक (2) अक्षर। जो पढ़ा लिखा है वही नेत्रवान् है, जिसने विद्या नहीं पढ़ी वह तो अन्धा है। उसके माथे में तो दो गड्ढ़े मात्र है नेत्र नहीं।

विद्वान पुरुष सुगन्धित पुष्पों के समान हैं, वे जहाँ जाते हैं वही आनन्द साथ ले जाते हैं। उनका सभी जगह घर है और सभी जगह स्वदेश है। विद्या धन है। अन्य वस्तुएँ तो उसकी समता में बहुत ही तुच्छ हैं। यह धन ऐसा है जो अगले जन्मों तक भी साथ रहता है। विद्या द्वारा संस्कारित की हुई बुद्धि आगामी जन्मों में क्रमशः उन्नति ही करती जाती है और उनके जीवन उच्चतम बनते हुए पूर्णता तक पहुँच जाते हैं।

कुँए को जितना गहरा खोदा जाए उसमें से उतना ही अधिक जल प्राप्त होता जाता है। जितना अधिक अध्ययन किया जाय, मनुष्य उतना ही ज्ञानवान बनता जाता है। विश्व क्या है? और इसमें कितनी आनन्दमयी शक्ति भरी हुई है इसे वही जान सकता है जिसने विद्या पढ़ी है। ऐसी अनुपम सम्पत्ति को उपार्जन करने में न जाने क्यों लोग आलस्य करते हैं। आयु का कोई प्रश्न नहीं हैं, चाहें मनुष्य बूढ़ा हो जाए या मरने के लिए चारपाई पड़ा हो तो भी विद्या प्राप्त करने में उसे उत्साहित होना चाहिए क्योंकि ज्ञान तो जन्म जन्मान्तरों तक साथ जाने वाली वस्तु है।

(ऋषि तिरुवल्लुवर) 
अखण्ड ज्योति-दिसं. 1942 पृष्ठ 19

Friday, 27 September 2019

DEAR BETI

       
                पितृसत्ता में वंश परंपरा के बहुत मायने होते हैं, जिसकी वजह से पुत्र की कामना की जाती है. मैं इससे ऊपर उठ चुका हूँ और इस सोच की मुख़ालफ़त करता हूँ. मैं जब जब तुम्हें देखता हूँ तो वंश परंपरा के सारे लोभ से परे चला जाता हूँ और ख़ुद को निर्मल पाता हूँ. तुम ही मेरी वारिस हो और इसके अतिरिक्त कोई पहचान ढोने की जरुरत नहीं. तुम्हारी अपनी स्वतंत्र पहचान बने, यही कामना है. इन्सान अपने कर्म से जाना जाए और अपनी कीर्ति से सम्मानित हो न कि वंश परंपरा से. तुम एक स्वतंत्र इकाई हो, व्यक्ति हो. तुम स्त्री यो नि में पैदा हुई हो मगर तुम्हें स्त्री बनाए रखने के तमाम उपकरणों और साज़िशों का घोर विरोध करुंगा. तुम्हें कभी गैरबराबरी का शिकार न होना पड़े और स्त्री होने के कारण कमतरी का अहसास न होने पाए, इसका ख़याल रखूंगा.

             मैं चाहता हूँ कि तुम आर्थिक रुप से इतनी मज़बूत बनो कि किसी पर निर्भरता न रहे. संपत्ति का बँटवारा असमान है भारतीय समाज में. क़ानून तो बदल गया लेकिन समाज का बदलना बहुत आसान नहीं. एक सदी और लगे शायद. बहुत उम्मीद नहीं कि संपत्ति से पितृसत्ता का क़ब्ज़ा हटेगा. यह लडाई कुछ तुम्हें और कुछ मुझे लड़नी होगी. पहल मुझे करना है और आगे तुम्हें संभालना है. ख़ुद को गिल्ट से बचाए रखना भी जरुरी है .

            इसके पहले ख़ुद को आर्थिक मज़बूती देना जरुरी है . वह शिक्षा और सूझ से आती है. शिक्षा में भी पहले बहुत भेदभाव हुए. सब मैने देखा है...

            बदलते वक़्त के साथ यह भेद खत्म हो रहा है. हमारे दौर के पिताओं ने इस मामले में गैरबराबरी लगभग खत्म कर दी. तुम्हें भी समान अवसर मिलेगा और तुम आर्थिक ताक़त लेकर उभरो .

#dearbeti
#ANKUSH

#WRITTENBY

#UNCLEJI

संस्कार


           सन्तोष मिश्रा जी के यहाँ पहला लड़का हुआ तो पत्नी ने कहा, "बच्चे को गुरुकुल में शिक्षा दिलवाते है, मैं सोच रही हूँ कि गुरुकुल में शिक्षा देकर उसे धर्म ज्ञाता पंडित योगी बनाऊंगी।"
सन्तोष जी ने पत्नी से कहा, "पाण्डित्य पूर्ण योगी बना कर इसे भूखा मारना है क्या!! मैं इसे बड़ा अफसर बनाऊंगा ताकि दुनिया में एक कामयाबी वाला इंसान बने।।"
संतोष जी सरकारी बैंक में मैनेजर के पद पर थे! पत्नी धार्मिक थी और इच्छा थी कि बेटा पाण्डित्य पूर्ण योगी बने, लेकिन सन्तोष जी नहीं माने।
दूसरा लड़का हुआ पत्नी ने जिद की, सन्तोष जी इस बार भी ना माने, तीसरा लड़का हुआ पत्नी ने फिर जिद की, लेकिन सन्तोष जी एक ही रट लगाते रहे, "कहां से खाएगा, कैसे गुजारा करेगा, और नही माने।"
चौथा लड़का हुआ, इस बार पत्नी की जिद के आगे सन्तोष जी हार गए, और अंततः उन्होंने गुरुकुल में शिक्षा दीक्षा दिलवाने के लिए वही भेज ही दिया।
अब धीरे धीरे समय का चक्र घूमा, अब वो दिन आ गया जब बच्चे अपने पैरों पे मजबूती से खड़े हो गए, पहले तीनों लड़कों ने मेहनत करके सरकारी नौकरियां हासिल कर ली, पहला डॉक्टर, दूसरा बैंक मैनेजर, तीसरा एक गोवरमेंट कंपनी मेें जॉब करने लगा।
एक दिन की बात है सन्तोष जी  पत्नी से बोले, "अरे भाग्यवान! देखा, मेरे तीनो होनहार बेटे सरकारी पदों पे हो गए न, अच्छी कमाई भी कर रहे है, तीनो की जिंदगी तो अब सेट हो गयी, कोई चिंता नही रहेगी अब इन तीनो को। लेकिन अफसोस मेरा सबसे छोटा बेटा गुुुरुकुल का आचार्य बन कर घर घर यज्ञ करवा रहा है, प्रवचन कर रहा है! जितना वह छ: महीने में कमाएगा उतना मेरा एक बेटा एक महीने में कमा लेगा, अरे भाग्यवान! तुमने अपनी मर्जी करवा कर बड़ी गलती की, तुम्हे भी आज इस पर पश्चाताप होता होगा, मुझे मालूम है, लेकिन तुम बोलती नही हो"।
पत्नी ने कहा, "हम मे से कोई एक गलत है, और ये आज दूध का दूध पानी का पानी हो जाना चाहिए, चलो अब हम परीक्षा ले लेते है चारों की, कौन गलत है कौन सही पता चल जाएगा।।"
दूसरे दिन शाम के वक्त पत्नी ने बाल बिखरा, अपनी साड़ी का पल्लू फाड़ कर और चेहरे पर एक दो नाखून के निशान मार कर आंगन मे बैठ गई और पतिदेव को अंदर कमरे मे छिपा दिया ..!!
बड़ा बेटा आया पूछा, "मम्मी क्या हुआ?"
माँ ने जवाब दिया, "तुम्हारे पापा ने मारा है!"
पहला बेटा :- "बुड्ढा, सठिया गया है क्या ? कहां है ? बुलाओतो जरा।।"
माँ ने कहा, "नही है , बाहर गए है!"
पहला बेटा - "आए तो मुझे बुला लेना, मैं कमरे मे हूँ, मेरा खाना निकाल दो मुझे भूख लगी है!"
ये कहकर कमरे मे चला गया।
दूसरा बेटा आया पूछा तो माँ ने वही जवाब दिया,
दूसरा बेटा : "क्या पगला गए है इस बुढ़ापे मे, उनसे कहना चुपचाप अपनी बची खुची गुजार ले, आए तो मुझे बुला लेना और मैं खाना खाकर आया हूँ सोना है मुझे, अगर आये तो मुझे अभी मत जगाना, सुबह खबर लेता हूँ उनकी।।",
ये कह कर वो भी अपने कमरे मे चला गया।
तीसरा बेटा आया पूछा तो आगबबूला हो गया, "इस बुढ़ापे मे अपनी औलादो के हाथ से जूते खाने वाले काम कर रहे है! इसने तो मर्यादा की सारी हदें पार कर दीं।"
यह कर वह भी अपने कमरे मे चला गया।।
संतोष जी अंदर बैठे बैठे सारी बाते सुन रहे थे, ऐसा लग रहा था कि जैसे उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो, और उसके आंसू नही रुक रहे थे, किस तरह इन बच्चो के लिए दिन रात मेहनत करके पाला पोसा, उनको बड़ा आदमी बनाया, जिसकी तमाम गलतियों को मैंने नजरअंदाज करके आगे बढ़ाया! और ये ऐसा बर्ताव, अब तो बर्दाश्त ही नहीं हो रहा.....
इतने मे चौथा बेटा घर मे ओम् ओम् ओम् करते हुए अंदर आया।।
माँ को इस हाल मे देखा तो भागते हुए आया, पूछा, तो माँ ने अब गंदे गंदे शब्दो मे अपने पति को बुरा भला कहा तो चौथे बेटे ने माँ का हाथ पकड़ कर समझाया कि "माँ आप पिताजी की प्राण हो, वो आपके बिना अधूरे हैं,---अगर पिता जी ने आपको कुछ कह दिया तो क्या हुआ, मैंने पिता जी को आज तक आपसे बत्तमीजी से बात करते हुए नही देखा, वो आपसे हमेशा प्रेम से बाते करते थे, जिन्होंने इतनी सारी खुशिया दी, आज नाराजगी से पेश आए तो क्या हुआ, हो सकता है आज उनको किसी बात को लेकर चिंता रही हो, हो ना हो माँ ! आप से कही गलती जरूर हुई होगी, अरे माँ ! पिता जी आपका कितना ख्याल रखते है, याद है न आपको, छ: साल पहले जब आपका स्वास्थ्य ठीक नही था,  तो पिता जी ने कितने दिनों तक आपकी सेवा कीे थी, वही भोजन बनाते थे, घर का सारा काम करते थे, कपड़े धोते थे, तब आपने फोन करके मुझे सूचना दी थी कि मैं संसार की सबसे भाग्यशाली औरत हूँ, तुम्हारे पिता जी मेरा बहुत ख्याल करते हैं।"
इतना सुनते ही बेटे को गले लगाकर फफक फफक कर रोने लगी, सन्तोष जी आँखो मे आंसू लिए सामने खड़े थे।
"अब बताइये क्या कहेंगे आप मेरे फैसले पर", पत्नी ने संतोष जी से पूछा।
सन्तोष जी ने तुरन्त अपने बेटे को गले लगा लिया, !
सन्तोष जी की धर्मपत्नी ने कहा, "ये शिक्षा इंग्लिश मीडियम स्कूलो मे नही दी जाती। माँ-बाप से कैसे पेश आना है, कैसे उनकी सेवा करनी है। ये तो गुरुकुल ही सिखा सकते हैं जहाँ वेद गीता रामायण जैसे ग्रन्थ पढाये जाते हैैं संस्कार दिये जाते हैं।
अब सन्तोष जी को एहसास हुआ- जिन बच्चो पर लाखो खर्च करके डिग्रीया दिलाई वे सब जाली निकले, असल में ज्ञानी तो वो सब बच्चे है, जिन्होंने जमीन पर बैठ कर पढ़ा है, मैं कितना बड़ा नासमझ था, फिर दिल से एक आवाज निकलती है, काश मैंने चारो बेटो को गुरुकुल में शिक्षा दीक्षा दी होती।

मातृमान पितृमान आचार्यावान् पुरुषो वेद:।।


Friday, 30 August 2019

मैं दुविधा में हूँ कि

कलम इतनी जो घिसती आयी है
महिला के हुस्न पर
मैं दुविधा में हूँ कि
ये मर्द लिखते इतना अच्छा हैं
या हम वाकई में दिखते इतना अच्छा हैं
नजरिया हसीन है उनका
या मैं सचमुच चाँद की मूरत हूँ
मैं दुविधा में हूँ
प्यार करते हैं वो मुझसे
या मैं बस उनकी एक जरूरत हूँ
काले मेरे बालों की पनाहों में वो सो जाना चाहते हैं
घने बालों में मेरे वो खो जाना चाहते हैं
पर यही बाल अगर मैं हटवाऊं अपने हाथों पर से मैं
तो उस दिन के लिए बस ना जाने क्यूँ
वो मुझसे दूर हो जाना चाहते हैं
क्या आँखों में मेरी सचमुच समुद्र सी गहराई है
या दिखती इनमें उन्हें हर औरत की परछाई है
मैं दुविधा में हूँ
आखिर उनकी बातों में कितनी सच्चाई है
क्योंकि बखान तो उन्होंने कर दिया मेरे बदन का
पर मेरे संदर्श की स्वरूप की एक बात तक नहीं बताई है
(संदर्श, स्वरूप= personality and prosperity)
हथेलियों को मेरी नाजुक वो लिखते हैं
मैं दुविधा में हूँ कि
क्या इनसे किये प्रयास भी उन्हें दिखते हैं
क्या कुछ भी दिखता है
उन्हें मेरे जिस्म के अलावा
ये शायरी सब उनकी ईमानदार है
या है एक छलावा
सच है अगर तो भी
मैं दुविधा में हूँ
मेरे होठों की लाली तो उन्हें याद रहती है
पर यहीं से टप की बोली उनसे सब कह कर भी
क्यूँ कुछ नहीं कहती है
क्या मेरी आवाज ही सुनते हैं वो
या बातों पर भी ध्यान उनका जाता है
क्या मैं बनी बनाई पसंद हूँ उन्हें
या पसंद हूँ वैसी जैसा मैंने खुद को तराशा है
मेरे रूप को खूबसूरत वो कहते हैं
पर खूबसूरती की परिभाषा वो नहीं बताते हैं
शायद प्यार करते हैं वो सिर्फ इस चेहरे से
पर मैं तब भी दुविधा में हूँ
क्योंकि इसके पीछे छिपे दर्द तो उन्हें नजर नहीं आते हैं
मीठा फल भी एक समय के बाद सड़ जाता है
मैं दुविधा में हूँ कि
किस बात पर लिखेंगे वो
जब मेरा बुढ़ापा आता है
ए कलम से घायल करने वाले क्षत्रिय
यूँ तो शिकायत नहीं हूँ कभी करती
पर हुस्न को ना लिखकर गर हुनर को लिखते
तो शायद शायरी तुम्हारी
घायल मुझे भी करती
फिर मेरे चले जाने के गम से
मुशायरों में तालियां नहीं बजती
बल्कि मेरे साथ बिताये हसीन
लम्हों की मुस्कराहट
हर महफ़िल में सबके लबों पर सजती

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