NitiN Raj SHARMA

Tuesday, 25 December 2018

असफलताओं की लंबी रात्रि के बाद होता है सफलता का सूर्योदय





जीवन में सफल होने की मंशा हर कोई अपने मन में पाले हुए है, मगर यह ऐसा नायाब उपहार है, जो सभी को नहीं मिलता । इसके हकदार तो सिर्फ वे लोग ही होते हैं, जिनके सिर पर कुछ कर गुजरने का जुनून होता है या फिर वे जो समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाने के लिए आतुर होते हैं ।
आज के तकनीकी युग में युवा वर्ग जीवन में सफलता की सीढ़ी चढ़ने के लिए लालायित है, लेकिन थोड़ा-सा परिश्रम या फिर कड़ी मेहनत के बावजूद नकारात्मक परिणाम उन्हें पूरी तरह से निराश कर देता है ।
यही वक्त मानव जीवन का अहम मोड़ होता है, क्योंकि ऐसे समय पर जो व्यक्ति हिम्मत हार कर असफलता को अपनी किस्मत मान लेता है, वे जिंदगी भर सिर्फ दूसरों की सफलता का दर्शक मात्र बन कर रह जाता हैं ।
मगर अपनी कमियों एवं खामियों को दूर कर सही दिशा में मेहनत करने का मार्ग चुनने और उस पर चलने वाले ही सफलता हासिल करते हैं ।
हालांकि ऐसे लोगों की सफलता की इबारत के पीछे कई बार मुंह की  खाने (हार) वाली कहानी भी छिपी होती है, क्योंकि जीवन में मिलने वाली अनेक विफलताएं ही व्यक्ति की सफलता का आधार रखती हैं ।
बस शर्त इतनी है कि व्यक्ति अपनी विफलताओं से सबक ले और दोगुनी ऊर्जा के साथ निर्धारित लक्ष्य (Goal) की ओर बढ़े।
आज के युवा वर्ग को यह बात हमेशा अपने जेहन में रखनी चाहिए कि सफलता के आयाम स्थापित करने वाला व्यक्ति कोई भी हो, हम सब को केवल उसकी सफलता नजर आती है, मगर उसके पीछे का कड़ा परिश्रम, लक्ष्य पाने का जुनून और इच्छाओं का त्याग नहीं दिखाई देता ।
समाज में अनेक ऐसे उदाहरण (Successful People) है, जिन्हें आज का युवा वर्ग अपना आदर्श मानता है, मगर उनके सफल होने से पहले का संघर्षपूर्ण जीवन जानने तक की कोशिश नहीं की जाती । हां लोगों को नजर आती है, तो सिर्फ उनकी सफलता ।
कोई माने या फिर न माने, यह सच्चाई है कि हर सफल व्यक्ति का जीवन कभी न कभी संघर्षपूर्ण रहता है । हम इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते कि जिंदगी का दूसरा नाम संघर्ष (Struggle) है ।
इसलिए आज के युवा वर्ग को यह बात समझनी होगी कि संघर्ष (Struggle), सही दिशा में की गई कड़ी मेहनत, विपरीत परिस्थितियों एवं असफलताओं की लंबी रात के बाद ही सफलता का सूर्योदय होता है ।

NITIN

हमारी सोच





बहुत समय पहले की बात है, किसी गाँव में एक किसान रहता था। उस किसान की एक बहुत ही सुन्दर बेटी थी। दुर्भाग्यवश, गाँव के जमींदार से उसने बहुत सारा धन उधार लिया हुआ था। जमीनदार बूढा और कुरूप था।
किसान की सुंदर बेटी को देखकर उसने सोचा क्यूँ न कर्जे के बदले किसान के सामने उसकी बेटी से विवाह का प्रस्ताव रखा जाये। जमींदार किसान के पास गया और उसने कहा – तुम अपनी बेटी का विवाह मेरे साथ कर दो, बदले में मैं तुम्हारा सारा कर्ज माफ़ कर दूंगा।
जमींदार की बात सुन कर किसान और किसान की बेटी के होश उड़ गए। वो कुछ उत्तर न दे पाये। तब जमींदार ने कहा – चलो गाँव की पंचायत के पास चलते हैं और जो निर्णय वे लेंगे उसे हम दोनों को ही मानना होगा।
वो सब मिल कर पंचायत के पास गए और उन्हें सब कह सुनाया। उनकी बात सुन कर पंचायत ने थोडा सोच विचार किया और कहा- ये मामला बड़ा उलझा हुआ है अतः हम इसका फैसला किस्मत पर छोड़ते हैं।
जमींदार सामने पड़े सफ़ेद और काले रोड़ों के ढेर से एक काला और एक सफ़ेद रोड़ा उठाकर एक थैले में रख देगा।  फिर लड़की बिना देखे उस थैले से एक रोड़ा उठाएगी, और उस आधार पर उसके पास तीन विकल्प होंगे:
1. अगर वो काला रोड़ा उठाती है तो उसे जमींदार से शादी करनी पड़ेगी और उसके पिता का कर्ज माफ़ कर दिया जायेगा।
2. अगर वो सफ़ेद पत्थर उठती है तो उसे जमींदार से शादी नहीं करनी पड़ेगी और उसके पिता का कर्फ़ भी माफ़ कर दिया जायेगा।
3. अगर लड़की पत्थर उठाने से मना करती है तो उसके पिता को जेल भेज दिया जायेगा। पंचायत के आदेशानुसार जमींदार झुका और उसने दो रोड़े उठा लिए। जब वो रोड़ा उठा रहा था तो तब किसान की बेटी ने देखा कि उस जमींदार ने दोनों काले रोड़े ही उठाये हैं और उन्हें थैले में डाल दिया है।
लड़की इस स्थिति से घबराये बिना सोचने लगी कि वो क्या कर सकती है, उसे तीन रास्ते नज़र आये:-
1. वह रोड़ा उठाने से मना कर दे और अपने पिता को जेल जाने दे।
2. सबको बता दे कि जमींदार दोनों काले पत्थर उठा कर सबको धोखा दे रहा हैं।
3. वह चुप रह कर काला पत्थर उठा ले और अपने पिता को कर्ज से बचाने के लिए जमींदार से शादी करके अपना जीवन बलिदान कर दे।
उसे लगा कि दूसरा तरीका सही है, पर तभी उसे एक और भी अच्छा उपाय सूझा।
उसने थैले में अपना हाथ डाला और एक रोड़ा अपने हाथ में ले लिया और बिना रोड़े की तरफ देखे उसके हाथ से फिसलने का नाटक किया, उसका रोड़ा अब हज़ारों रोड़ों के ढेर में गिर चुका था और उनमे ही कहीं खो चुका था।
लड़की ने कहा – हे भगवान! मैं कितनी बेवकूफ हूँ। लेकिन कोई बात नहीं आप लोग थैले के अन्दर देख लीजिये कि कौन से रंग का रोड़ा बचा है, तब आपको पता चल जायेगा कि मैंने कौन सा उठाया था जो मेरे हाथ से गिर गया।
थैले में बचा हुआ रोड़ा काला था, सब लोगों ने मान लिया कि लड़की ने सफ़ेद पत्थर ही उठाया था। जमींदार के अन्दर इतना साहस नहीं था कि वो अपनी चोरी मान ले।
लड़की ने अपनी सोच से असम्भव को संभव कर दिया ।
मित्रों, हमारे जीवन में भी कई बार ऐसी परिस्थितियां आ जाती हैं जहाँ सब कुछ धुंधला दीखता है, हर रास्ता नाकामयाबी की ओर जाता महसूस होता है पर ऐसे समय में यदि हम सोचने का प्रयास करें तो उस लड़की की तरह अपनी मुशिकलें दूर कर सकते हैं।

आत्मचिंतन के क्षण



       ◾ दोष दिखाने वाले को अपना शुभ चिंतक मानकर उसका आभार मानने की अपेक्षा मनुष्य जब उलटे उस पर कु्रद्ध होता है, शत्रुता मानता और अपना अपमान अनुभव करता है, तो यह कहना चाहिए कि उसने सच्ची प्रगति की ओर चलने का अभी एक पैर उठाना भी नहीं सीखा।
      ◾ ऐसे विश्वास और सिद्धान्तों को अपनाइये जिनसे लोक कल्याण की दशा में प्रगति होती हो। उन विश्वासों और सिद्धान्तों सको हृदय के भीतरी कोने में गहराई तक उतार लीजिए। इतनी दृढ़ता जमा लीजिए कि भ्रष्टाचार और प्रलोभन सामने उपस्थित होने पर भी आप उन पर दृढ़ रहें, परीक्षा देने एवं त्याग करने का अवसर आवे तब भी विचलित न हों। वे विश्वास श्रद्धास्प्द होने चाहिए, प्राणों से अधिक प्यारे होने चाहिए।
      ◾ अपने को असमर्थ, अशक्त एवं असहाय मत समझिये। ऐसे विचारों का परित्याग कर दीजिए कि साधनों के अभाव में हम किस प्रकार आगे बढ़ सकेंगे। स्मरण रखिए, शक्ति का स्रोत साधन में नहीं, भावना में है। यदि आपकी आकाँक्षाएँ आगे बढ़ने के लिए व्यग्र हो रही हैं, उन्नति करने की तीव्र इच्छाएँ बलवती हो रही हैं, तो विश्वास रखिये साधन आपको प्राप्त होकर रहेंगे।
     

Monday, 26 November 2018

धीरे-धीरे सीख


 A PROCESS OF LEARNING

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
मुझे हर उस बात पर प्रतिक्रिया नहीं देना चाहिए जो मुझे चिंतित करती है।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
जिन्होंने मुझे चोट दी है मुझे उन्हें चोट नहीं देना है।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
शायद सबसे बड़ी समझदारी का लक्षण भिड़ जाने के बजाय अलग हट जाने में है।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
अपने साथ हुए प्रत्येक बुरे बर्ताव पर प्रतिक्रिया करने में आपकी जो ऊर्जा खर्च होती है वह आपको खाली कर देती है और आपको दूसरी अच्छी चीजों को देखने से रोक देती है।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
मैं हर आदमी से वैसा व्यवहार नहीं पा सकूंगा जिसकी मैं अपेक्षा करता हूँ।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
किसी का दिल जीतने के लिए बहुत कठोर प्रयास करना समय और ऊर्जा की बर्बादी है और यह आपको कुछ नहीं देता, केवल खालीपन से भर देता है।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
जवाब नहीं देने का अर्थ यह कदापि नहीं कि यह सब मुझे स्वीकार्य है, बल्कि यह कि मैं इससे ऊपर उठ जाना बेहतर समझता हूँ।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
कभी-कभी कुछ नहीं कहना सब कुछ बोल देता है।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
किसी परेशान करने वाली बात पर प्रतिक्रिया देकर आप अपनी भावनाओं पर नियंत्रण की शक्ति किसी दूसरे को दे बैठते हैं।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
मैं कोई प्रतिक्रिया दे दूँ तो भी कुछ बदलने वाला नहीं है। इससे लोग अचानक मुझे प्यार और सम्मान नहीं देने लगेंगे। यह उनकी सोच में कोई जादुई बदलाव नहीं ला पायेगा।

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...
जिंदगी तब बेहतर हो जाती है जब आप इसे अपने आसपास की घटनाओं पर केंद्रित करने के बजाय उसपर केंद्रित कर देते हैं जो आपके अंतर्मन में घटित हो रहा है।

आप अपने आप पर और अपनी आंतरिक शांति के लिए काम करिए और आपको बोध होगा कि चिंतित करने वाली हर छोटी-छोटी बात पर प्रतिक्रिया 'नहीं' देना एक स्वस्थ और प्रसन्न जीवन का 'प्रथम अवयव' है।
सच कहें तो कभी- कभी कुछ अपनी ही मूर्खता पूर्ण बातों या कामों से पछतावा भी होता है तो कभी कभी कुछ ईमानदारी भरा ठीक कर पाने की खुशी भी।

अब पता नहीं क्यों दूसरों की निंदा प्रशंसा में कुछ ज्यादा अंतर नहीं सा लगता।

पर जो भी हो ये भरोसा सा है कि अब समझदारी की तरफ सुनिश्चित कदम दर कदम बढ़ रहे हैं,
मन में छाई रहने वाली शांति, खुशी, संतुष्टि इसकी गवाह है कि पथिक की राह ठीक है,
एक दिन मंजिल भी मिल ही जाएगी।

उस मंजिल को तय करने का मजा ही शायद जिंदगी के अनूठे से जगह जगह बिखरे रंग हैं।

NITIN

Monday, 24 September 2018

A Poem


फ़ांसी कॆ फन्दॊं कॊ हम , गर्दन दान दिया करतॆ हैं ! 
गॊरी जैसॆ शैतानॊं कॊ भी ,जीवन-दान दिया करतॆ हैं !! 
क्षमाशीलता का जब कॊई , अपमान किया करता है ! 
अंधा राजपूत भी तब, प्रत्यंचा तान लिया करता है !! 
भारत की पावन धरती नें , ऎसॆ कितनॆं बॆटॆ जायॆ हैं ! 
स्वाभिमान की रक्षा मॆं,उन नॆं निज शीश चढ़ायॆ हैं, !!
दॆश की ख़ातिर ज़िन्दगी हवन मॆं, झॊंकतॆ रहॆ हैं झॊंकतॆ रहॆंगॆ ! 
कलम की नॊंक सॆ आँधियॊं कॊ हम,रॊकतॆ रहॆ हैं रॊकतॆ रहॆंगॆ !! 
स्वाभिमान की रक्षा मॆं, महिलायॆं ज़ौहर कर जाती हैं ! 
आन नहीं जानॆं दॆतीं जलकर, ज्वाला मॆं मर जाती हैं !! 
याद करॊ पन्ना माँ जिस नॆं, दॆवासन कॊ हिला दिया ! 
राजकुँवर की मृत्यु-सॆज पर, निज बॆटॆ कॊ सुला दिया !! 
भारत की तॊ नारी भी, दुर्गा है रणचण्डी है, काली है ! 
तलवार उठा लॆ हाँथॊं मॆं, तॊ महारानी झांसी वाली है !! 
खाकर घास की रॊटी गर्व सॆ सीना, ठॊंकतॆ रहॆ हैं ठॊंकतॆ रहॆंगॆ ! 
कलम की नॊंक सॆ आँधियॊं कॊ हम,रॊकतॆ रहॆ हैं रॊकतॆ रहॆंगॆ !! 
हम पूजा करतॆ मर्यादाऒं कॊ, आदर्शॊं कॊ यह सच है ! 
पर पीठ नहीं दिखलातॆ हम, संघर्षॊं कॊ यह भी सच है !! 
माना कि इस भूमि पर,मर्यादा पुरुषॊत्तम राम हुयॆ हैं ! 
रिपु-मर्दन परसुराम कॆ भी,इसी धरा पर संग्राम हुयॆ हैं!! 
अहंकार कॆ दानव जब भी,पौरुष कॊ ललकारा करतॆ हैं ! 
लंका मॆं घुस कर रघु वंशज, रावण कॊ मारा करतॆ हैं !! 
सत्य का साथ दॆ सदा हम असत्य कॊ,टॊकतॆ रहॆ हैं टॊकतॆ रहॆंगॆ ! 
कलम की नॊंक सॆ आँधियॊं कॊ हम,रॊकतॆ रहॆ हैं रॊकतॆ रहॆंगॆ !! 
दॆश की एकता अखंडता कॊ, तॊड़नॆ मॆं लगॆ हैं बहुत ! 
शान्ति कॆ कलश कॊ आज, फॊड़नॆ मॆं लगॆ है बहुत !! 
दॆश की सरहदॊं कॊ तॊड़नॆ, मरॊड़नॆ मॆं लगॆ हैं बहुत ! 
भारत माँ का आज रक्त, निचॊड़नॆं मॆं लगॆ हैं बहुत !! 
न कॊई धर्म है उनका और,न कॊई ईमान है उनका ! 
भारत कॆ नमक कॆ ख़िलाफ़,गन्दा बयान है जिनका !! 
“भारतीय” दॆश कॆ ख़िलाफ़ गद्दार कई, भॊंकतॆ रहॆ हैं भॊंकतॆ रहॆंगॆ !! 
कलम की नॊंक सॆ आँधियॊं कॊ हम,रॊकतॆ रहॆ हैं रॊकतॆ रहॆंगॆ !!




Sunday, 23 September 2018

The Key - Patience

                  As we know that patience is the key of our every desire but what we choose is to hurry up. Every time somehow I have had a new experience but the cost I am paying for this experience is very huge.
Here I am not narrating a story related to me but I am just trying to say the simple thing which we know already.
now the real question is, why we cannot prefer patience? the answer is very simple - because we have no courage to be patience.
The very first thing we need is we have to be courageous.
lecturing is very easier than practicing.
So again the question is very same, why do we not practice?

may this will happen with each one of us.

  advice : practice before lecture.
be calm
be patient
be positive

all are the words but when we live actual meaning of these significant words then we understand the things easily. what all I can say is that if you are ready enough to pay huge then you will definitely get bigger than what you paid.

and most interesting thing is that you need to pay without a penny.
no need of any amount to make sure our-self strength.   

Thanks  

Sunday, 12 August 2018

Bitter ! The Truth

As we all know that the truth is always bitter, but we are all familiar with the truth when it is the hard vala truth then it's automatically very tough to digest.

Today I am talking about the one truth happened with me.

Everything is fair in love and war.

The very above line is just to write and to talk about. Infact when we feel the situation then we wouldn't have had any options left with us.

And the trust again !
To whom you trust when you don't trust yourself.
Love again !
To whom you love when you don't love yourself.
Which truth I have been telling here ?

nothing !

You know ! What we speak or what we hear is all lie.
The truth or the fact is that we can't explain or express in words the exact feeling what we feel.
So love and trust yourself.
When you accept your bitterness then no truth would create any hard to you.

Know your thoughts
Know your schedule
Know your strength
Know your inner peace

You will be a champion.

NitiN SHARMA



Tuesday, 15 May 2018

सच्चा सुधार



    मनुष्य में अपूर्णता और त्रुटियाँ भरी हुई हैं, इससे अज्ञानवश बहुत से पाप होते रहते हैं। समय आने पर जिनके लिए वह स्वयं पश्चाताप करता है और सुधार के मार्ग पर चल खड़ा होता है। इसलिए किसी व्यक्ति का सच्चा दोष देखने पर भी हमें चाहियें, कि हम उसके प्रति घृणा द्वेष, क्रोध अथवा और किसी प्रकार का अपमान पूर्वक बर्ताव न करें अर्थात् सख्ती से सुधार की चेष्टा न करे। 

  बहुत बार हमारे क्रोध और अपमान को दोषी व्यक्ति सह लेता है। क्योंकि पाप के भय से वह भयभीत होता है। उसकी दूषित वृत्ति कुछ समय के लिए दब जाती है, परन्तु सर्वदा के लिए उसका नाश नहीं होता। हमारे द्वारा किये गये अपमान का बदला लेना उसके मन में खटकता रहता है, जो उसकी दोषाग्नी में घृत जैसा काम करता है। 

  हमारे लिए उसकी दोष पूर्ण चेष्टा होने शुरू हो जाती है, जो काम, क्रोध और हिंसा की वृत्तियाँ को जगा कर हमारे पतन का कारण होती है, यदि किसी का सच्चा सुधार करना हो तो उसके दोषों को जड़ से उखाड़ना चाहियें। 

  प्रेम, सेवा, स्वार्थ त्याग, द्वारा उसके मन पर अधिकार करना चाहियें क्योंकि मन ही अच्छी बुरी वृत्तियों का स्थान है। परन्तु इस प्रकार दोषों को दूर करने के लिए असीम स्वार्थ त्याग और आत्म विश्वास की आवश्यकता है।

धन्यवाद



Saturday, 21 April 2018

टकराव के तीन सिद्धांत

   


  किसी का सामना करना कठिन होता है, क्योंकि कई बार इस का परिणाम यह होता है कि व्यक्ति संताप में डूब जाता है। आप जिस से टकराव कर रहे हैं वह व्यक्ति असहमति प्रकट कर सकता है, विरोध कर सकता है, अथवा यदि वह ईमानदार हो तो क्षमा भी मांग सकता है। परंतु यह संवाद कभी भी इतना सरल एवं सुखद नहीं होता। यह संवाद दो दलों या सरकारों के बीच हो सकता है, या फिर पती-पत्नी, माता-पिता और संतान, दो मित्र या एक प्रबंधक एवं कार्यकर्ता के बीच हो सकता है। कभी कभी सकारात्मक एवं रचनात्मक रूप से आमना सामना करना ही असहमति को दूर करने का एक मात्र मार्ग होता है। किसी से टकराव करना एक प्रकार का संवाद है – एक अवांछनीय संवाद जिस से व्यक्ति अपने को दोषी, लज्जित एवं क्रोधित महसूस कर सकता है। तो लीजिए मैं आप के सामने प्रस्तुत करता हूँ टकराव के तीन अमूल्य सिद्धांत।

🔶 ऊँचे स्वर में बात न करें

🔷 यदि आप किसी भी सकारात्मक परिणाम की आशा कर रहे हैं तो यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि आप चिल्लायें नहीं। इस विषय पर विचार करें – हम किसी का सामना इसलिए करते हैं क्योंकि हम चाहते हैं कि वह हमारी बात सुने तथा अपनी लापरवाही को स्वीकार करे अथवा यह स्वीकार करे कि उस के कारण हमे पीड़ा पहुँची है। इस का एक मात्र मार्ग है कि आप ऊँचे स्वर में बात न करें। क्यों? मानव मन सुखद वार्तालाप करने के लिए स्वाभाविक रूप से उत्सुक है। जब आप धीमे स्वर में बात करेंगे तो हो सकता है कि वे आप से सहमत ना हों, परंतु उनका मस्तिष्क उन्हें आप की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देगा। वार्तालाप करने और विवाद करने में प्राथमिक अंतर स्वर की ध्वनि एवं प्रबलता है। वार्तालाप एवं विवाद दोनों करते समय असहमति हो सकती है परंतु बहस के समय दोनों व्यक्ति केवल स्वयं बात करने में मग्न रहते हैं, दूसरों की सुन ने में नहीं। जब आप किसी पर चिल्लाते हैं, वे तुरंत ही मानसिक रूप से स्वयं को आप से दूर कर देते हैं। उनका मन वार्तालाप को छोड़ विषय से दूर हट जाता है अथवा आत्मरक्षात्मक हो जाता है। परंतु यदि आप सामान्य स्वर में बात करें, हो सकता है कि आप को लगे वे स्थिति की गंभीरता को समझ नहीं पा रहे हैं, किंतु अवश्य ही आप के शब्द उन के मन में घुस जाएंगे। हाँ इस का यह अर्थ नहीं कि वे अपना व्यवहार अवश्य ही बदल देंगे।

🔶 आक्रामक रूप से बात न करें

🔷 याद रखें कि किसी का सामना करने का लक्ष्य यह है कि वह व्यक्ति आप के दृष्टिकोण को समझ सके तथा वह अपना व्यवहार बदले। आक्रामक रूप से बात कर के या उनकी निंदा कर के आप इस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। उन्हें प्रायश्चित करने का अवसर दें। आप यह मान कर चलें कि उन से एक भूल हो गई। फिर वार्तालाप को इस विषय पर केंद्रित रखें कि कैसे उनका व्यवहार आप को या आप दोनों के रिश्ते को हानी पहुँचा रहा है अथवा कैसे यह उनके हित में नहीं है। ऐसा करने पर वह आप की बात और ध्यान से सुनेंगे। किंतु यदि हम उनकी आक्रामक रूप की आलोचना करें, उन्हें दोषी ठहरायें तब हम स्वतः दोनों के बीच एक विशाल बाधा खड़ा कर देते हैं। वे आत्मरक्षात्मक हो जाते हैं तथा अपनी सुरक्षा के लिए प्रत्याक्रमण करते हैं। इस कारण दोनों व्यक्तियों में दूरी और बढ़ जाती है, वे क्रोधित हो जाते हैं और टकराव करने के उद्देश्य की पूर्ती ही नहीं हो पाती।

🔶 विषय से न भटकें

🔷 तीनों सिद्धांतों में यही सबसे कठिन है। कई बार जब हम किसी से टकराव करते हैं वे उस विषय को टालना या उस से दूर रहना चाहते हैं। किसी प्रकार के स्पष्टीकरण, क्षमा याचना या परिणामों से बचने के लिए, वास्तविक मुद्दे से भटकने की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। यदि दोनों व्यक्ति भावनात्मक हो कर विषय से भटकने लगें तो वार्तालाप में किसी प्रकार की संवेदनशीलता बनाए रखना असंभव हो जाता है। शीघ्र ही ऐसा वार्तालाप एक बहस अथवा एक कटुतापूर्ण असहमति बन जाएगा। जब अन्य व्यक्ति विषय से भटकने लगते हैं, तो आप सम रहकर उन्हें बात पूरी कर लेने दें, फिर विनम्रता से वार्तालाप को प्राथमिक विषय पर ले आएं। यदि आप भी विषय से भटकते हैं तो यह केवल एक व्यर्थ वाद विवाद बन कर रह जाएगी जिसका कोई सफल परिणाम नहीं होगा। यह अति आवश्यक है कि आप केवल मुद्दे पर ही केंद्रित रहें तथा संक्षिप्त रूप से बात करें। उदाहरण के लिए, यदि आप किसी से उन के देर से आने के विषय में बात करना चाहते हैं, तो केवल वर्तमान उदाहरण के विषय में ही बात करें। यह ना कहें कि वे सदैव देर से आते हैं, या वे कुशल या सक्षम नहीं हैं।

🔶 याद रखें कि किसी से टकराव करने का उद्देश्य यह है कि आप उस व्यक्ति को यह अहसास दिला सकें कि आप उसके कुछ कार्यों से असहमत हैं तथा उन कार्यों को नापसंद करते हैं। उद्देश्य उन को नीचा दिखाना नहीं है। इसलिए परिणाम इस पर निर्भर है कि आप किन शब्दों का प्रयोग करते हैं, किस स्वर में बात करते हैं, ठीक किस समय बात करते हैं तथा आप के शरीर के हाव-भाव कैसे हैं। किंतु यदि आप को बार बार एक ही विषय पर किसी का सामना करना पड़े, फिर तो उन में परिवर्तन लाने की आशा बहुत कम है, क्योंकि बुद्धिमान के लिए तो संकेत ही पर्याप्त है। यदि वह व्यक्ति स्वयं की भूल को स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं, तो किसी भी प्रकार के संवाद का कोई परिणाम नहीं निकल सकता।

🔷 मुल्ला नसरुद्दीन से उसका गधा उधार लेने के लिए उस का एक मित्र उस के पास आया। “मेरा गधा तो कल रात को ही भाग गया। और अब मुझे वह मिल नहीं रहा है”, मुल्ला ने कहा। संशयपूर्ण ढंग से उसके मित्र ने उसे देखा। मुल्ला ने अविचलित एवं शांत चेहरा बनाए रखा। तभी उसका गधा चिल्लाने लगा। “मुल्ला! तुम्हारे घर से मुझे तुम्हारे गधे की आवाज़ सुनाई दे रही है। तुमने मुझसे झूठ बोला! मैं समझता था कि तुम मेरे सच्चे मित्र हो।” “निस्संदेह! क्या तुम्हे अपने मित्र के शब्दों से अधिक एक गधे की आवाज़ पर विश्वास है।”

🔶 जीवन रंगीन एवं आकर्षक इसलिए है क्योंकि इस में विभिन्न रंग हैं; सभी रंग केवल श्वेत नहीं हो सकते, ना ही केवल लाल या केवल काला। उसी प्रकार सभी संवाद सुखद नहीं हो सकते हैं। व्यावसायिक एवं व्यक्तिगत रिश्तों में सफलता इस पर निर्भर है कि आप अप्रिय संवाद तथा मतभेद से कैसे निपटते हैं।




Wednesday, 18 April 2018

गलतियां और उनके सुधार



  तैरना सीखने वाला डूब जाने के सिवाय और सब गलतियाँ कर सकता है। तब वह अचानक किसी दिन देखता है कि उसे तैरना आ गया। इसलिए गलतियाँ होती है तो निराश होने की आवश्यकता नहीं है। जिस तरह बिना गलतियाँ किये तैरना नहीं आता उसी तरह गलतियों के बिना जिन्दगी जीना भी नहीं सीखा जाता।

    मनुष्य अपूर्ण है इसलिए उसके कार्यों में गलती हो सकती है। इसमें शर्म की कोई बात नहीं है शर्म की बात यह है कि गलती को सही साबित करने और उस पर अड़े रहने की कोशिश की जाय। गलती को ढूँढ़ना मानना और सुधारना किसी मनुष्य के बड़प्पन का कारण हो सकता है। जो सीखने और सुधारने में लगा हुआ है वही एक दिन उस स्थिति को पहुँचेगा जिसमें त्रुटियों और बुराइयों से छुटकारा मिलता है।


Wednesday, 11 April 2018

नारी का वर्चस्व- विश्व का उत्कर्ष



🔶 नर और नारी यों दोनों ही भगवान की दायीं-बायीं ऑंख, दायीं बायीं भुजा के समान हैं । उनका स्तर, मूल्य, उपयोग, कर्त्तव्यत, अधिकार पूर्णत: समान है । फिर भी उनमें भावनात्मक दृष्टि से कुछ भौतिक विशेषताएँ हैं । नर की प्रकृति में परिश्रम, उपार्जन, संघर्ष, कठोरता जैसे गुणों की विशेषता है वह बुद्धि और कर्म प्रधान है । नारी में कला, लज्जा, शालीनता, स्नेह, ममता जैसे सद्गुण हैं वह भाव और सृजन प्रधान है । यह दोनों ही गुण अपने-अपने स्थान पर महत्त्वपूर्ण हं् । उनका समन्वय ही एक पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करता है ।

🔷 सामयिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नर और नारी की इन विशेषताओं का उपयोग किया जाता है । युद्ध कौशल में पुरुष की प्रकृति ही उपयुक्त थी सो उसे आगे रहना पड़ा । जो वर्ग आगे रहता है, नेतृत्व भी उसी के हाथ में आ जाता है । जो वर्ग पीछे रहते हैं उन्हें अनुगमन करना पड़ता हैं । परिस्थितियों ने नर-नारी के समान स्तर को छोटा-बड़ा कर दिया, पुरुष को प्रभुता मिली - नारी उसकी अनुचरी बन गई । जहॉं प्रेम सद्भाव की स्थिति थी वहॉं वह उस आधार पर हुआ और जहॉं दबाव और विवश्सता की स्थिति थी वहाँ दमन पूर्वक किया गया । दोनों ही परिस्थितियों में पुरुष आगे रहा और नारी पीछे ।

🔶 नये युग के लिये हमें नई नारी का सृजन करना होगा, जो विश्व के भावनात्मक क्षेत्र को अपने मजबूत हाथों में सम्भायल सके और अपनी स्वाभाविक महत्ता का लाभ समस्त संसार को देकर नारकीय दावानल में जलने वाले कोटि-कोटि नर-पशुओं को नर-नारायण के रूप में परिणत करना सम्भव करके दिखा सकें । नारी के उत्कर्ष - वर्चस्व को बढ़ाकर उसे नेतृत्व का उत्तरदायित्व जैसे-जैसे सौंपा जायेगा वैसे-वैसे विश्व शान्ति की घड़ी निकट आती जायेगी ।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य


Saturday, 10 March 2018

अभागो! आँखें खोलो!!


        अभागे को आलस्य अच्छा लगता है। परिश्रम करने से ही है और अधर्म अनीति से भरे हुए कार्य करने के सोच विचार करता रहता है। सदा भ्रमित, उनींदा, चिड़चिड़ा, व्याकुल और संतप्त सा रहता है। दुनिया में लोग उसे अविश्वासी, धोखेबाज, धूर्त, स्वार्थी तथा निष्ठुर दिखाई पड़ते हैं। भलों की संगति उसे नहीं सुहाती, आलसी, प्रमादी, नशेबाज, चोर, व्यभिचारी, वाचाल और नटखट लोगों से मित्रता बढ़ाता है। कलह करना, कटुवचन बोलना, पराई घात में रहना, गंदगी, मलीनता और ईर्ष्या में रहना यह उसे बहुत रुचता है।

       ऐसे अभागे लोग इस दुनिया में बहुत है। उन्हें विद्या प्राप्त करने से, सज्जनों की संगति में बैठने से, शुभ कर्म और विचारों से चिढ़ होती है। झूठे मित्रों और सच्चे शत्रुओं की संख्या दिन दिन बढ़ता चलता है। अपने बराबर बुद्धिमान उसे तीनों लोकों में और कोई दिखाई नहीं पड़ता। खुशाकय, चापलूस, चाटुकार और धूर्तों की संगति में सुख मानता है और हितकारक, खरी खरी बात कहने वालों को पास भी खड़े नहीं होने देता नाम के पथ पर सरपट दौड़ता हुआ वह मंद भागी क्षण भर में विपत्तियों के भारी भारी पाषाण अपने ऊपर लादता चला जाता है।

       कोई अच्छी बात कहना जानता नहीं तो भी विद्वानों की सभा में वह निर्बलता पूर्वक बेतुका सुर अलापता ही चला आता है। शाम का संचय, परिश्रम, उन्नति का मार्ग निहित है यह बात उसके गले नहीं उतरती और न यह बात समझ में आती है कि अपने अन्दर की त्रुटियों को ढूँढ़ निकालना एवं उन्हें दूर करने का प्रचण्ड प्रयत्न करना जीवन सफल बनाने के लिए आवश्यक है। हे अभागे मनुष्य! अपनी आस्तीन में सर्प के समान बैठे हुए इस दुर्भाग्य को जान। तुम क्यों नहीं देखते? क्यों नहीं पहचानते?

✍🏻 समर्थ गुरु रामदास


Thursday, 8 March 2018

महिला दिवस विशेष

किसी ने सही कहा है कि औरत ही वह तत्व है जो एक पुरुष को महान पुरुष बनाती है।

आज हम सब महिला दिवस तो मना ही रहे हैं लेकिन महिलाओं की ऐसी स्थिति पर अपने अपने भाषण भी दे ही रहे हैं। लेकिन जब जब बात असल जिंदगी की आती है तब तब हम उसे कमजोर कर देते हैं। कुछ चंद अनजान लोगों का डर दिखाकर उसे शांत कर देते हैं।

आखिर क्यों ?

अगर एक पुरुष भी औरत का साथ ना दे तो चलेगा लेकिन एक औरत दूसरी औरत का साथ देने लगे तो समाज ही नहीं ये देश ये दुनिया सब कुछ चंद मिनटों में बदल जायेंगे। लेकिन उन्हें ऐसी उलझनों में फसाया जाता है ताकि वो अपने व्यक्तित्व के बारे में सोच ही ना सकें, और उन्हें उसका अहसास कराने वाला कौन??

उसका परिवार, बाप , भाई,

समय समय पर देखा गया है कि जिस बाप ने या जिस भाई ने समाज के खिलाफ जाकर अपने बेटी और बहन का साथ दिया है उसी बेटी और बहन ने दुनिया जीत ली है। ना जाने कितने उदाहरण हैं ऐसे जिनसे हम सीख भी सकते हैं और सिखा भी सकते हैं, लेकिन ऐसा हो क्यों नहीं पाता ??

माँ का बिम्ब होता है एक बालक और अगर वो लड़की है तो वो भी माँ है जिसे अपना बचपन फिर से जीने को मिला है लेकिन फिर भी वो अपने बचपन को खराब कर लेती है।
क्यों ??

और ना जाने निजी जीवन में भी ऐसी कितनी समस्याएं हैं जिनका कोई जबाब हमें नहीं मिला है और शायद मिले भी ना।
क्यों ?
पता नहीं ।

मेरी माँ ने मुझे बताया कि औरत खुद ही अपनी इस स्थिति की जिम्मेदार है। मैंने पूछा कैसे ? उन्होंने बताया कि पहले उसका बचपन उसका बाप खराब कर देता है फिर जवानी उसका पति खराब करता है और दो चरण खराब जाने के बाद तीसरे और सबसे महत्वपूर्ण चरण में उसके बच्चे उसका साथ नहीं देते।

मैं रो गया।
मैंने पूछा कि इसका समाधान क्या है ?
उन्होंने बताया कि तू जान गया है तो खुद मत करना कभी गलत। और अगर उसका बाप या पति दोनों में से कोई भी जिसमें की बाप ज्यादा, उसका साथ दे और अपना भरोसा दे तो वही लड़की पूरी दुनिया जीत के उन्हें दे सकती है।

एक ही लड़की और इतने रूप ,
कैसे संभव है ये सब ?
क्योंकि एक आदमी ये सब कभी नहीं कर सकता।
ओशो ने कहा है सत्य ही कहा है।
एक औरत सिर्फ एक नाजुक औरत ही नहीं है वो जब चाहे तो चंडी बनकर दुनिया को दिखा सकती है और जो चाहे उसे पा भी सकती है।

वही बहन, प्रेमिका, पत्नी, माँ, दादी, वैश्या और ना जाने क्या क्या....
हर एक रूप में वो अपना वजूद तलाशती रहती है लेकिन उसे अपने वजूद का जबाब क्यों नहीं मिल पाता ??
गीता के पहले अघ्याय में कहा गया है कि इस दुनिया में जितनी भी समस्याएं है उनका सिर्फ और सिर्फ एक ही कारण है और वो है अज्ञान।

उस अज्ञान को दूर करके ही हम अपनी इन सभी समस्याओं का समाधान निकाल सकते है।

ऐसा हुआ भी है और आगे भी होता रहेगा, कि अगर कोई तुम्हारी वजह से इतना बदल जाये कि उसके सारे जीवन पर तुम्हारा ही प्रभाव हो बस ऐसा ही करते जाना, यही लक्ष्य होना चाहिए।
चाहे वो लड़की हो या लड़का।
प्रकृति ने भेद नहीं किया तो हम कौन हैं भेद करने वाले ।

मैं अपनी बस उसी शपथ को दोहरा रहा हूँ जो ना जाने कब मैंने ही खुद से कर दी।
ऐसा हो आप करके देखें क्या पता कोई आपसे मिल के अपनी सारी दुनिया ही भूल जाये ।
और जब ऐसा feel होता है तो असल मैं वही जिंदगी है बाकी तो सब जंजाल है।

Never ever break someone's faith because they actually admire you.
I myself have done something better in life that's why I asked everyone to do some betterments in life so that we can change ourselves in to better one and through that we can help in changing also.

A good human being = a good person
A good person = a good family
A good family = a good society
A good society = a good village or city
A good village or city = a good country
A good country = a beautiful world.

Be what you want but take it as a challenge.

Gain knowledge
Have power
Sharp your mind .

Thanks
#happywomensday2018

NitiN Raj SHARMA

Friday, 16 February 2018

जीवन का अर्थ


🔶 जीवन का अर्थ है-सक्रियता, उल्लास, प्रफुल्लता। निराशा का परिणाम होता है-निष्क्रियता, हताशा, भय, उद्विग्रता और अशांति।जीवन है प्रवाह, निराशा है सडऩ। जीवन का पुष्प आशा की उष्ण किरणों के स्पर्श से खिलता है, निराशा का तुषार उसे कुम्हलाने को बाध्य करता है। निराशा एक भ्रांति के अतिरिक्त और कुछ नहीं।
   
🔷 आज तक ऐसा कोई व्यक्ति पैदा नहीं हुआ, जिसके जीवन में विपत्तियाँ और विफलताएँ न आयी हों। संसार चक्र किसी एक व्यक्ति की इच्छा के संकेतों पर गतिशील नहीं है। वह अपनी चाल से चलता है। इसके अलग-अलग धागों के बीच व्यक्तियों का अपना एक निजी संसार होता है। चक्र-गति के साथ आरोह-अवरोह अनिवार्य है, अवश्यंभावी है। उस समय सम्मुख उपस्थित परिस्थितियों का निदान-उपचार भी आवश्यक है, पर उसके कारण कुंठित हो जाना, व्यक्ति के जीवन की एक हास्यास्पद प्रवृत्ति मात्र है। उसका विश्व गति से कोई भी तालमेल नहीं। निराशा व्यक्ति का अपना ही एक मनमाना और आत्मघाती उत्पादन है। ईश्वर की सृष्टि में वह एक विजातीय तत्त्व है। इसलिए निराशा का कोई भी स्वागत करने वाला नहीं। 
   
🔶 सामान्य जीवन के उतार-चढ़ावों से ही जो उद्विग्र, अशांत हो जाते हैं, वे जीवन में किसी बड़े काम को करने की कल्पना भी नहीं कर सकते। बड़े काम तो धैर्य, अध्यवसाय तथा कठोर श्रम की अपेक्षा रखते हैं। मानसिक संतुलन वहाँ पहली शर्त है। तरह-तरह की जटिल, पेचीदी परिस्थितियाँ बड़े कामों में पैदा होती रहती हैं। अशांत, व्यग्र मन:स्थिति में डरके बीच कोई रास्ता नहीं ढूँढा जा सकता। असफलता और हताशा ही ऐसे व्यक्तियों की ललाट रेखा है।
   
🔷 संसार बना ही सफलता-असफलता दोनों के ताने बाने से है। सभी व्यक्ति असफलताओं, अवरोधों से हताश होकर, हिम्मत हारकर बैठ जाएँ, तब तो संसार की सारी सक्रियता ही नष्ट हो जाए। पतझड़ के बाद वसंत-रात्रि के बाद दिन-दु:ख के बाद सुख तो सृष्टि चक्र की सुनिश्चित गति व्यवस्था है। इसमें निराश होने जैसी कोई बात है नहीं।
   
🔶 इससे भी उच्च मन:स्थिति उन महापुरुषों की होती है, जो अपने समय की पतनोन्मुख प्रवृत्तियों से जूझने का संकल्प लेकर आजीवन चलते रहते हैं, यह जानते हुए भी कि पीड़ा का विस्तार, अतिव्यापक है और पतन की शक्तियाँ अति प्रबल हैं। अपने प्रयास का प्रत्यक्ष परिणाम संभवत: सामान्य लोगों को नहीं ही दिखे, तो भी वे लक्ष्य पथ पर धीर- गंभीर भाव से बढ़ते ही जाते हैं। वे उत्कृष्टतर मन:स्थिति में जीते हैं।
   
🔷 ऐसे ही व्यक्ति देश, समाज और युग के पतनोन्मुख प्रवाह को विपरीत दिशा में मोड़ देते हैं। अपनी गतिविधियों से आये परिवर्तनों को-नवीन दिशाधारा को वे स्वयं तो स्पष्टï देख पाते हैं, पर सामान्य व्यक्ति अपने परिवेश में कोई अधिक स्थूल परिवर्तन उस समय तक उत्पन्न नहीं देख पाने के कारण उन परिवर्तनों और सफलताओं का आकलन नहीं कर पाते। 
   
🔶 विशाल वटवृक्ष के पत्तों में वायु की प्रत्येक पुलक से स्पन्दन होता है, पीपल के पत्ते हवा के हर झोकों से खड़-खड़ कर उठते हैं, पर इससे स्वयं पीपल या बरगद पर रंचमात्र हलचल नहीं होती। जबकि छोटे कमजोर पौधे झंझा के एक ही थपेड़े में लोटपोट हो जाते हैं। अवरोधों की राई को पहाड़ मान बैठने और निराशा के नैश अंधकार में ऊषा की स्वर्णिम आभा का अस्तित्व ही भुला बैठने की गलती तो नहीं ही करनी चाहिए, निराशा एक भ्रांति है, यथार्थ जीवन में उसका कोई स्थान नहीं है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य


Tuesday, 16 January 2018

ना हार मानें और ना ही रुकें

 
    आगत कठिनाइयों को देखकर निठाल हो बैठना और रोते कलपते समय गँवाना, विपत्ति को दूना करने के समान है। हमें यह मानकर ही चलना पड़ेगा कि जीवन आरोह अवरोध के ताने-बाने से बुना गया है। धूप, छाँह की तरह सफलताओं और असफलताओं की उभयपक्षीय हलचलें होती ही रहती है और होती ही रहेगी। सर्वथा सुख-सुविधाओं से भरा जीवन क्रम कदाचित् ही कोई जीता है। ज्वार-भाटों की तरह उठाने और गिराने वाली परिस्थितियाँ अपने ढंग से आती और अपनी राह चली जाती है। वट पर बैठकर उतार-चढ़ाव का आनन्द लेने वाले ही जीवन नाटक के अनुभवी कलाकार कहे जा सकते हैं।

    सदा दिन ही बना रहे रात कभी आये ही नहीं भला यह कैसे हो सकता है? जन्मोत्सव ही मनाये जाते रहे, मरण का रुदन सुनने को न मिले यह कैसे सम्भव है। सुख की घड़ियाँ ही सामने रहें, दुःख के दिन कभी न आयें यह मानकर चलना यथार्थता की ओर से आंखें मूँद लेने के समान है। बुद्धिमान वे है जो सुखद परिस्थितियों का समुचित लाभ उठाते हैं और दुःख की घड़ी आने पर उसका सामना करने के लिए आवश्यक धैर्य और साधन इकट्ठा करते रहते हैं।

   ऐसे ईर्ष्यालु इस दुनिया में कम नहीं जो किसी का सुख सन्तोष फूटी आँखों नहीं देख सकते। जिनके अन्धेर अनाचार में बाधा पड़ती है वे भी शत्रु बन बैठते हैं। अनुचित लाभ उठाने के उत्सुक भी शोषण एवं आक्रमण से बाज़ कहाँ आते हैं और अनन्त काल तक रहेगा। उनसे बच निकलना कठिन है। हाँ, इतना हो सकता है कि अपना शौर्य साहस इतना विकसित कर लिया जाय कि उन्हें छेड़-छाड़ करने का साहस ही न हो। व्यक्तिगत समर्थता के अतिरिक्त आपने साथी सहकारी बढ़ाकर भी आततायी की गति विधियों पर अंकुश किया जा सकता है। प्रतिरोध और प्रतिकार की शक्ति बढ़ाकर ही आक्रमणकारियों से अपनी आँशिक सुरक्षा हो सकती है। उनका सामना ही न करना पड़े, कुछ अनुचित अवांछनीय सामने आये ही नहीं, ऐसा सोचना आकाश कुसुम पाने जैसी बात-कल्पना है। अवरोधों से जूझने और संघर्षों के बीच अपना रास्ता बनाने के अतिरिक्त यहाँ और कोई रास्ता है ही नहीं।

Sunday, 7 January 2018

गलती और सुधार


मुश्किल है लगातार खुद को प्रेरित रख पाना लेकिन नामुमकिन नहीं।
प्रेरित रहें और प्रेरणाशील बनने का प्रयास लगातार रहना चाहिए।
कोई भी इस संसार में 100 प्रतिशत सही नहीं है। गलतियां अगर हों तो उन्हें तुरंत सुधार कर दोगुनी ताकत से आने वाले समय को ध्यान में रखते हुए हमें जुट जाना चाहिए।

साथ में अपने आस पास जो असीम ताकतें हैं उनका प्रयोग करना चाहिए। कभी ना कभी कोई आपको जरूर मिलेगा जिससे आपका मार्गदर्शन हो सके लेकिन उसे पहचानने की जिम्मेदारी आपकी है।

ये आवश्यक नहीं कि हमें हर एक सुविधा हो तभी हम कामयाब बनेंगे या कोई आवश्यक कदम उठाएंगे जरूरी है कि प्रत्येक पल का लाभ लें और आगे की ओर प्रयास करते रहें, लेकिन इन सभी के लिए हमारा वर्तमान में होना आवश्यक है।

वर्तमान में रहते हुए भविष्य की ओर निगाह रखें और अपना प्रयास करते रहें।
दूसरे की गलतियों से हम ज्यादा सीखते हैं और उसकी गलती का परिणाम अगर बुरा है तो हमें कोई अधिकार नहीं मिलता कि हम भी वही काम दोहराएं। उससे बचने की कला हमें दूसरों से अलग बनाती है। यही हमारी कामयाबी की सीढ़ी भी बनती है।

Monday, 1 January 2018

2017 - A year's recall


It has started 2018 and on the very first day I want to recall my 2017.
Have a look

When 2017 started it was full of opportunities for me so I took those all with full hands. All and everything was going on right way. But in the month of April it was time when I missed someone and yes she was !!!!
Then all went quite better for 2 or 3 months. Later on it started unnecessarily egoistic battles between staff members and then I sorted it out.
Then due to hectic schedule could not make it better.
Then diwali and then december.
And in December I broke into tears just because of someone's unacceptable allegations.
I don't want to name them but I pray for them and yes I wished them too , may they get what they want.
But in real it is the toughest to get what we want.

What I learnt ?

I learnt lots of things
1).     never get attached to someone more than yourself because then pain of separation is quite unbearable.

2).     to obey your elder ones and specially your parents is far more important than anything else.

3).     Do your work with full joy.

4).     Love is more important than hate. So be in love where ever you are , what ever you do.

Yet again happy new year 2018.

नूतन वर्ष 2018

Almost 7 months it has been far away from blogs and mostly 2017 was away from here but there in 2018 shall update regularly.

नव वर्ष 2018 आपके लिए मंगलमय हो।
इसी मनोकामना के साथ कुछ पंक्तियाँ आपके लिए।

तूफानी लहरें हों अम्बर के पहरे हों,
पुरवा के दामन पर दाग बहुत गहरे हों,
सागर के मांझी, मत मन को तू हारना,
जीवन के क्रम में, जो खोया है पाना है,
पतझर का मतलब है फिर बसंत आना है ;

राजवंश रूठे तो राज मुकुट टूटे तो
सीतापति राघव से राजमहल छूटे तो
आशा मत हार, पर सागर के एक बार,
पत्थर में प्राण फूंक सेतू बनाना है,
अंधियारे के आगे दीप फिर जलाना है,
पतझर का मतलब है फिर बसंत आना है;

घर-घर चाहे छोड़े, सूरज भी मुँह मोड़े
विदुर रहे मौन, छीने राज्य, स्वर्ण रथ,घोड़े
माँ का बस प्यार, सार गीता का साथ रहे,
पंचतत्व सौ पर है भारी बतलाना है
जीवन का राजसूय यज्ञ फिर कराना है,
पतझर का मतलब है फिर बसंत आना है ;

Happy new year 2018
🙏