कलम इतनी जो घिसती आयी है
महिला के हुस्न पर
मैं दुविधा में हूँ कि
ये मर्द लिखते इतना अच्छा हैं
या हम वाकई में दिखते इतना अच्छा हैं
नजरिया हसीन है उनका
या मैं सचमुच चाँद की मूरत हूँ
मैं दुविधा में हूँ
प्यार करते हैं वो मुझसे
या मैं बस उनकी एक जरूरत हूँ
काले मेरे बालों की पनाहों में वो सो जाना चाहते हैं
घने बालों में मेरे वो खो जाना चाहते हैं
पर यही बाल अगर मैं हटवाऊं अपने हाथों पर से मैं
तो उस दिन के लिए बस ना जाने क्यूँ
वो मुझसे दूर हो जाना चाहते हैं
क्या आँखों में मेरी सचमुच समुद्र सी गहराई है
या दिखती इनमें उन्हें हर औरत की परछाई है
मैं दुविधा में हूँ
आखिर उनकी बातों में कितनी सच्चाई है
क्योंकि बखान तो उन्होंने कर दिया मेरे बदन का
पर मेरे संदर्श की स्वरूप की एक बात तक नहीं बताई है
(संदर्श, स्वरूप= personality and prosperity)
हथेलियों को मेरी नाजुक वो लिखते हैं
मैं दुविधा में हूँ कि
क्या इनसे किये प्रयास भी उन्हें दिखते हैं
क्या कुछ भी दिखता है
उन्हें मेरे जिस्म के अलावा
ये शायरी सब उनकी ईमानदार है
या है एक छलावा
सच है अगर तो भी
मैं दुविधा में हूँ
मेरे होठों की लाली तो उन्हें याद रहती है
पर यहीं से टप की बोली उनसे सब कह कर भी
क्यूँ कुछ नहीं कहती है
क्या मेरी आवाज ही सुनते हैं वो
या बातों पर भी ध्यान उनका जाता है
क्या मैं बनी बनाई पसंद हूँ उन्हें
या पसंद हूँ वैसी जैसा मैंने खुद को तराशा है
मेरे रूप को खूबसूरत वो कहते हैं
पर खूबसूरती की परिभाषा वो नहीं बताते हैं
शायद प्यार करते हैं वो सिर्फ इस चेहरे से
पर मैं तब भी दुविधा में हूँ
क्योंकि इसके पीछे छिपे दर्द तो उन्हें नजर नहीं आते हैं
मीठा फल भी एक समय के बाद सड़ जाता है
मैं दुविधा में हूँ कि
किस बात पर लिखेंगे वो
जब मेरा बुढ़ापा आता है
ए कलम से घायल करने वाले क्षत्रिय
यूँ तो शिकायत नहीं हूँ कभी करती
पर हुस्न को ना लिखकर गर हुनर को लिखते
तो शायद शायरी तुम्हारी
घायल मुझे भी करती
फिर मेरे चले जाने के गम से
मुशायरों में तालियां नहीं बजती
बल्कि मेरे साथ बिताये हसीन
लम्हों की मुस्कराहट
हर महफ़िल में सबके लबों पर सजती
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