सभी अभिभावकों को दीपावली व नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें।
अभिभावक व शिक्षक दोनो का उददेश्य छात्र के भविष्य का निर्माण करना होता है। शिक्षक छात्र को ज्ञान देता है और माता-पिता बच्चे के व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं और इन दोनो के संयोग से छात्र के चरित्र का निर्माण होता है। किसी बच्चे का व्यक्तित्व उसके माता-पिता के आचरण व चरित्र का दर्पण होता है और उसका ज्ञान शिक्षक के ज्ञान की सीमा को प्रदर्शित करता है।
वर्तमान में बदली हुई सामाजिक परिस्थितियों में जहां शिक्षक के अधिकार बहुत ही सीमित है, माता-पिता का दायित्व कहीं अधिक बढ़ जाता है। विद्यालय में एक छात्र मात्र 5-6 घंटे रहता है और शेष समय घर पर व्यतीत करता है। ऐसे में शिक्षक उसे ज्ञान तो दे सकता है, किन्तु उसके चरित्र निर्माण में माता-पिता का सहयोग अत्यंत आवश्यक है। किसी भी बच्चे की पहली पाठशाला उसका अपना घर होता है एवं माता पिता उसके पहले शिक्षक। बच्चे जो घर में देखते हैं, उत्सुकतावश उसे ही अपनाना शुरू कर देते हैं और उन्ही छोटी-छोटी चीजों को अपनाने से उनके आचरण व चरित्र का निर्माण शुरू होता है, इसलिए अभिभावकों का व्यवहार अत्यंत संयमित व संतुलित होना अति आवश्यक है।
लक्ष्य विद्या मंदिर का उददेश्य मात्र छात्र को शिक्षित करना ही नहीं बल्कि उसके चरित्र का निर्माण करना भी है, क्योंकि बिना चरित्र के शिक्षा दिशाहीन है। लक्ष्य विद्या मंदिर का प्रयास शिक्षक व अभिभावक के मध्य तालमेल स्थापित करना है, जिससे छात्र के उजज्वल भविष्य का निर्माण हो सके। शिक्षक का कार्य केवल छात्र के दिमाग में शिक्षा को जबरन भरना नहीं है, बल्कि उसे भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करना है। शिक्षा मात्र पुस्तकों में लिखा हुआ ज्ञान नहीं है बल्कि बिना संयम व आत्मविश्वास खोये, कुछ भी सुनने की योग्यता ही शिक्षा है और ज्ञान वह शक्तिशाली हथियार है, जिससे एक छात्र दुनिया को बदल सकता है। हमारा यह प्रयास मात्र दीवार पर टंगा कैलेण्डर भर न रहे, बल्कि हम इसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें।
लक्ष्य विद्या मंदिर का प्रयास छात्र को ऐसी शिक्षा और ज्ञान देना है, जिससे वह समाज की दशा व दिशा को बदल सके, किन्तु अभिभावकों के सहयोग के बिना यह असंभव है। बच्चे किसी भी समाज व् राष्ट्र का भविष्य होते हैं और हमारे इस प्रयास में आपका सहयोग प्रार्थनीय है।
आईये हम और आप मिलकर एक ऐसे समाज का निर्माण करें जिसमें हम बिना किसी रूकावट के अपने सपनों को साकार कर सकें जिससे दूसरों को भी प्रेरणा मिले।
धन्यवाद
Friday, 21 October 2016
एक अपील अभिभावकों के नाम
Monday, 12 September 2016
Mathematics formulas
............
(α+в+c)²= α²+в²+c²+2(αв+вc+cα)
1. (α+в)²= α²+2αв+в²
2. (α+в)²= (α-в)²+4αв b
3. (α-в)²= α²-2αв+в²
4. (α-в)²= f(α+в)²-4αв
5. α² + в²= (α+в)² - 2αв.
6. α² + в²= (α-в)² + 2αв.
7. α²-в² = (α + в)(α - в)
8. 2(α² + в²) = (α+ в)² + (α - в)²
9. 4αв = (α + в)² -(α-в)²
10. αв ={(α+в)/2}²-{(α-в)/2}²
11. (α + в + ¢)² = α² + в² + ¢² + 2(αв + в¢ + ¢α)
12. (α + в)³ = α³ + 3α²в + 3αв² + в³
13. (α + в)³ = α³ + в³ + 3αв(α + в)
14. (α-в)³=α³-3α²в+3αв²-в³
15. α³ + в³ = (α + в) (α² -αв + в²)
16. α³ + в³ = (α+ в)³ -3αв(α+ в)
17. α³ -в³ = (α -в) (α² + αв + в²)
18. α³ -в³ = (α-в)³ + 3αв(α-в)
ѕιη0° =0
ѕιη30° = 1/2
ѕιη45° = 1/√2
ѕιη60° = √3/2
ѕιη90° = 1
¢σѕ ιѕ σρρσѕιтє σƒ ѕιη
тαη0° = 0
тαη30° = 1/√3
тαη45° = 1
тαη60° = √3
тαη90° = ∞
¢σт ιѕ σρρσѕιтє σƒ тαη
ѕє¢0° = 1
ѕє¢30° = 2/√3
ѕє¢45° = √2
ѕє¢60° = 2
ѕє¢90° = ∞
¢σѕє¢ ιѕ σρρσѕιтє σƒ ѕє¢
2ѕιηα¢σѕв=ѕιη(α+в)+ѕιη(α-в)
2¢σѕαѕιηв=ѕιη(α+в)-ѕιη(α-в)
2¢σѕα¢σѕв=¢σѕ(α+в)+¢σѕ(α-в)
2ѕιηαѕιηв=¢σѕ(α-в)-¢σѕ(α+в)
ѕιη(α+в)=ѕιηα ¢σѕв+ ¢σѕα ѕιηв.
» ¢σѕ(α+в)=¢σѕα ¢σѕв - ѕιηα ѕιηв.
» ѕιη(α-в)=ѕιηα¢σѕв-¢σѕαѕιηв.
» ¢σѕ(α-в)=¢σѕα¢σѕв+ѕιηαѕιηв.
» тαη(α+в)= (тαηα + тαηв)/ (1−тαηαтαηв)
» тαη(α−в)= (тαηα − тαηв) / (1+ тαηαтαηв)
» ¢σт(α+в)= (¢σтα¢σтв −1) / (¢σтα + ¢σтв)
» ¢σт(α−в)= (¢σтα¢σтв + 1) / (¢σтв− ¢σтα)
» ѕιη(α+в)=ѕιηα ¢σѕв+ ¢σѕα ѕιηв.
» ¢σѕ(α+в)=¢σѕα ¢σѕв +ѕιηα ѕιηв.
» ѕιη(α-в)=ѕιηα¢σѕв-¢σѕαѕιηв.
» ¢σѕ(α-в)=¢σѕα¢σѕв+ѕιηαѕιηв.
» тαη(α+в)= (тαηα + тαηв)/ (1−тαηαтαηв)
» тαη(α−в)= (тαηα − тαηв) / (1+ тαηαтαηв)
» ¢σт(α+в)= (¢σтα¢σтв −1) / (¢σтα + ¢σтв)
» ¢σт(α−в)= (¢σтα¢σтв + 1) / (¢σтв− ¢σтα)
α/ѕιηα = в/ѕιηв = ¢/ѕιη¢ = 2я
» α = в ¢σѕ¢ + ¢ ¢σѕв
» в = α ¢σѕ¢ + ¢ ¢σѕα
» ¢ = α ¢σѕв + в ¢σѕα
» ¢σѕα = (в² + ¢²− α²) / 2в¢
» ¢σѕв = (¢² + α²− в²) / 2¢α
» ¢σѕ¢ = (α² + в²− ¢²) / 2¢α
» Δ = αв¢/4я
» ѕιηΘ = 0 тнєη,Θ = ηΠ
» ѕιηΘ = 1 тнєη,Θ = (4η + 1)Π/2
» ѕιηΘ =−1 тнєη,Θ = (4η− 1)Π/2
» ѕιηΘ = ѕιηα тнєη,Θ = ηΠ (−1)^ηα
1. ѕιη2α = 2ѕιηα¢σѕα
2. ¢σѕ2α = ¢σѕ²α − ѕιη²α
3. ¢σѕ2α = 2¢σѕ²α − 1
4. ¢σѕ2α = 1 − ѕιη²α
5. 2ѕιη²α = 1 − ¢σѕ2α
6. 1 + ѕιη2α = (ѕιηα + ¢σѕα)²
7. 1 − ѕιη2α = (ѕιηα − ¢σѕα)²
8. тαη2α = 2тαηα / (1 − тαη²α)
9. ѕιη2α = 2тαηα / (1 + тαη²α)
10. ¢σѕ2α = (1 − тαη²α) / (1 + тαη²α)
11. 4ѕιη³α = 3ѕιηα − ѕιη3α
12. 4¢σѕ³α = 3¢σѕα + ¢σѕ3α
» ѕιη²Θ+¢σѕ²Θ=1
» ѕє¢²Θ-тαη²Θ=1
» ¢σѕє¢²Θ-¢σт²Θ=1
» ѕιηΘ=1/¢σѕє¢Θ
» ¢σѕє¢Θ=1/ѕιηΘ
» ¢σѕΘ=1/ѕє¢Θ
» ѕє¢Θ=1/¢σѕΘ
» тαηΘ=1/¢σтΘ
» ¢σтΘ=1/тαηΘ
» тαηΘ=ѕιηΘ/¢σѕΘ
Thanks
Wednesday, 20 April 2016
अपनी काबिलियत जानें
किसी जंगल में एक बहुत बड़ा तालाब था . तालाब के पास एक बागीचा था, जिसमे अनेक प्रकार के पेड़ पौधे लगे थे दूर- दूर से लोग वहाँ आते और बागीचे की तारीफ करते।
गुलाब के पेड़ पे लगा पत्ता हर रोज लोगों को आते-जाते और फूलों की तारीफ करते देखता, उसे लगता की हो सकता है एक दिन कोई उसकी भी तारीफ करे. पर जब काफी दिन बीत जाने के बाद भी किसी ने उसकी तारीफ नहीं की तो वो काफी हीन महसूस करने लगा उसके अन्दर तरह-तरह के विचार आने लगे— सभी लोग गुलाब और अन्य फूलों की तारीफ करते नहीं थकते पर मुझे कोई देखता तक नहीं, शायद मेरा जीवन किसी काम का नहीं …कहाँ ये खूबसूरत फूल और कहाँ मैं… और ऐसे विचार सोच कर वो पत्ता काफी उदास रहने लगा।
दिन यूँ ही बीत रहे थे कि एक दिन जंगल में बड़ी जोर-जोर से हवा चलने लगी और देखते-देखते उसने आंधी का रूप ले लिया. बागीचे के पेड़-पौधे तहस-नहस होने लगे, देखते-देखते सभी फूल ज़मीन पर गिर कर निढाल हो गए, पत्ता भी अपनी शाखा से अलग हो गया और उड़ते-उड़ते तालाब में जा गिरा।
पत्ते ने देखा कि उससे कुछ ही दूर पर कहीं से एक चींटी हवा के झोंको की वजह से तालाब में आ गिरी थी और अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष कर रही थी।
चींटी प्रयास करते-करते काफी थक चुकी थी और उसे अपनी मृत्यु तय लग रही थी कि तभी पत्ते ने उसे आवाज़ दी, घबराओ नहीं, आओ, मैं तुम्हारी मदद कर देता हूँ। और ऐसा कहते हुए अपनी उपर बैठा लिया. आंधी रुकते-रुकते पत्ता तालाब के एक छोर पर पहुँच गया; चींटी किनारे पर पहुँच कर बहुत खुश हो गयी और बोली, आपने आज मेरी जान बचा कर बहुत बड़ा उपकार किया है, सचमुच आप महान हैं, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!
यह सुनकर पत्ता भावुक हो गया और बोला, धन्यवाद तो मुझे करना चाहिए, क्योंकि तुम्हारी वजह से आज पहली बार मेरा सामना मेरी काबिलियत से हुआ, जिससे मैं आज तक अनजान था. आज पहली बार मैंने अपने जीवन के मकसद और अपनी ताकत को पहचान पाया हूँ…
हाँ जी ,
ईश्वर ने हम सभी को अनोखी शक्तियां दी हैं; कई बार हम खुद अपनी काबिलियत से अनजान होते हैं और समय आने पर हमें इसका पता चलता है, हमें इस बात को समझना चाहिए कि किसी एक काम में असफल होने का मतलब हमेशा के लिए अयोग्य होना नही है. खुद की काबिलियत को पहचान कर आप वह काम कर सकते हैं, जो आज तक किसी ने नही किया है!
धन्यवाद
Saturday, 26 March 2016
सभ्यता क्या है ?
.......
सभ्यता क्या है , उसकी पहचान क्या है, इन बातोँ पर मै अक्सर सोचा करता था। लोगो के मुख से जो सुनता था और नैतिक शिक्षा की किताबो मे जो बाते लिखी होती थी, मै उनसे न जाने क्यो सहमत नही हो पाता था, दरअसल, मुझे Civilized Man सभ्यता स्कूल मे बताया गया कि सभ्यता के लिए इंसान को टिप-टाप दिखना चाहिए। उसके नाखून कटे हो, कपङे बिल्कुल साफ सुथरे हो। लेकिन मै इस पर इत्तेफाक नही कर पाया।
कई बार खेलने के दौरान मेरी शर्ट गंदी हो जाती, तो टीचर कहते कि इतने गंदे कपङे पहने हो, सभ्यता बिल्कुल नही है। एक दिन मैने टीचर से पूछ ही लिया-क्या जीवन के लिए इस तरह की सभ्यता आवश्यक है? अगर कोई गरीब है, उसके कपङे फटे हुए है, तो क्या वह सभ्य नही है? मेरे ये सवाल सुनकर उन्होने मुझे बङे प्रेम से समझाया, देखो, कपङे फटे हो, तो कोई बात नही, कितु वे धुले हुए साफ-सुथरे और प्रेस किए हुए होने चाहिए। अध्यापक की यह बात भी मेरे गले नही नही उतरी। मैँ सोचने लगा, यह कैसी सभ्यता ? जिसके पास खाने को भी पैसे न हो, वह फटे कपङे सिलवाकर, धुलवाकर, और प्रेस करवा कर कैसे पहन सकता है ? अगर वह ऐसा नही कर सकता तो क्या वह असभ्य हो जायेगा ?
अपनी किताबो मे भी मुझे सभ्य होने की यही पहचान लिखी हुई मिली। घर के बङे लोग भी कहते- सभ्य लोग ऐसा नही करते, वैसा करते हैँ। इस तरह की हिदायते सुनने को मिलती, लेकिन एक दिन मेरी जिदगी मे एक घटना घट गई, जब मैने सभ्यता का अर्थ तो जाना ही, जीवन की मेरी दिशा ही बदल गई।
एक दिन जब मै अखबार पढ़ रहा था, तो मेरी नजर एक छोटी सी खबर पर टिक गई। उस खबर मे लिखा था कि किस तरह एक महिला का प्रसव सङक पर हुआ और किसी भी व्यक्ति ने उस महिला की मदद नही की। मै यह खबर पढ़ कर आश्चर्यचकित हो गया कि सभ्यता की चादर ओढ़े ये समाज इतना निष्ठुर कैसे हो सकता है? मेरे मन मे यह खयाल आया कि उस समय सभ्य लोग कहां थे, जिन्होने धुले हुए प्रेस किए हुए कपङे पहने थे? शायद वे अपने कपङे गंदे होने के डर से मदद नही कर सके होगे। शायद उनकी वह सभ्यता आङे आ गई होगी।उस खबर का मुझ पर इतना ज्यादा प्रभाव पङा कि मुझे यह समझ मे आ गया कि सभ्यता भीतर की चीज है, वह बाहरी आवरण नही। इस घटना के कारण ही मुझमे यह बदलाव आया कि जहां भी किसी की मदद करने का अवसर मिलता, वहां मै तत्परता से पहुंच जाता था। मैने कभी इस बात की चिँता नही की कि मेरे कपङे गंदे हो जाएंगे और मुझ पर असभ्य होने का टैग लग जाएगा। मै अंततःसमझ गया था कि सभ्य होने का अर्थ संवेदनशील होना है।
धन्यवाद
Friday, 25 March 2016
दूसरे की गलती
एक बार गुरू आत्मानंद ने अपने चार शिष्यों को एक पाठ पढाया। पाठ पढाने के बाद वह अपने शिष्यों से बोले- “अब तुम चारों इस पाठ का स्वाध्ययन कर इसे याद करो। इस बीच यह ध्यान रखना कि तुममें से कोई बोले नहीं। एक घंटे बाद मै तुमसे इस पाठ के बारे में बात करुँगा।“
यह कह कर गुरू आत्मानंद वहाँ से चले गए। उनके जाने के बाद चारों शिष्य बैठ कर पाठ का अध्ययन करने लगे। अचानक बादल घिर आए और वर्षा की संभावना दिखने लगी।
यह देख कर एक शिष्य बोला- “लगता है तेज बारिश होगी।“
ये सुन कर दूसरा शिष्य बोला- “तुम्हें बोलना नहीं चाहिये था। गुरू जी ने मना किया था। तुमने गुरू जी की आज्ञा भंग कर दी।“
तभी तीसरा शिष्य भी बोल पडा- “तुम भी तो बोल रहे हो।“
इस तरह तीन शिष्य बोल पडे, अब सिर्फ चौथा शिष्य बचा वो कुछ भी न बोला। चुपचाप पढता रहा।
एक घंटे बाद गुरू जी लौट आए। उन्हें देखते ही एक शिष्य बोला- “गुरूजी! यह मौन नहीं रहा, बोल दिया।“
दुसरा बोला- “तो तुम कहाँ मौन थे, तुम भी तो बोले थे।“
तीसरा बोला- “इन दोनो ने बोलकर आपकी आज्ञा भंग कर दी।“
ये सुन पहले वाले दोनो फिर बोले- “तो तुम कौन सा मौन थे, तुम भी तो हमारे साथ बोले थे।“
चौथा शिष्य अब भी चुप था।
यह देख गुरू जी बोले- “मतलब तो ये हुवा कि तुम तीनो ही बोल पडे। बस ये चौथा शिष्य ही चुप रहा। अर्थात सिर्फ इसी ने मेरी शिक्षा ग्रहण की और मेरी बात का अनुसरण किया। यह निश्चय ही आगे योग्य आदमी बनेगा। परंतु तुम तीनो पर मुझे संदेह है। एक तो तुम तीनों ने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया; और वह भी एक-दूसरे की गलती बताने के लिये। और ऐसा करने में तुम सबों ने स्वयं की गलती पर ध्यान न दिया।
आमतौर पर सभी लोग ऐसा ही करते हैं। दूसरों को गलत बताने और साबित करने की कोशिश में स्वयं कब गलती कर बैठते हैं। उन्हें इसका एहसास भी नहीं होता।
यह सुनकर तीनो शिष्य लज्जित हो गये। उन्होंने अपनी भूल स्वीकार की, गुरू जी से क्षमा माँगी और स्वयं को सुधारने का वचन दिया।
धन्यवाद
Tuesday, 22 March 2016
ख्याल आया कि अगर.....
एक शब्द है (जुदाई)
इसे सह कर तो देखो
तुम टूट कर बिखर ना जाओ तो कहना,
एक शब्द है (आँसू)
दिल में छुपा कर रखो
तुम्हारी आँखों से ना निकल जाए तो कहना,
एक शब्द है (मोहब्बत)
इसे कर के देखो तुम
तड़प ना जाओ तो कहना,
Thursday, 17 March 2016
यही इस दुनिया का नियम है।
रात के समय एक दुकानदार अपनी दुकान बन्द ही कर रहा था
कि एक कुत्ता दुकान में आया । उसके मुॅंह में एक थैली थी। जिसमें सामान की लिस्ट और पैसे थे।
दुकानदार ने पैसे लेकर सामान उस थैली में भर दिया।
कुत्ते ने थैली मुॅंह मे उठा ली और चला गया।
दुकानदार आश्चर्यचकित होके कुत्ते के पीछे पीछे गया
ये देखने की इतने समझदार कुत्ते का मालिक कौन है।
कुत्ता बस स्टाॅप पर खडा रहा। थोडी देर बाद एक बस आई जिसमें चढ गया।
कंडक्टर के पास आते ही अपनी गर्दन आगे कर दी।
उस के गले के बेल्ट में पैसे और उसका पता भी था।
कंडक्टर ने पैसे लेकर टिकट कुत्ते के गले के बेल्ट मे रख दिया।
अपना स्टाॅप आते ही कुत्ता आगे के दरवाजे पे चला गया और पूॅंछ हिलाकर कंडक्टर को इशारा कर दिया।
बस के रुकते ही उतरकर चल दिया।
दुकानदार भी पीछे पीछे चल रहा था।
कुत्ते ने घर का दरवाजा अपने पैरोंसे २-३ बार खटखटाया।
अन्दर से उसका मालिक आया और लाठी से उसकी पिटाई कर दी।
दुकानदार ने मालिक से इसका कारण पूछा ।
मालिक बोला :
"साले ने मेरी नींद खराब कर दी। चाबी साथ लेके नहीं जा सकता था गधा।"
जीवन की भी यही सच्चाई है। आपसे लोगों की अपेक्षाओं का कोई अन्त नहीं है।
जहाँ आप चूके वहीं पर बुराई निकाल लेते हैं
और पिछली सारी अच्छाईयों को भूल जाते हैं।
देख लो । यह संसार हैं ।
Friday, 4 March 2016
क्या से क्या हो गया ? और क्या होता जा रहा है ?
1985-
Bhai Engineer sahab ka ghar kahan hai?
Yahan se aage 20 km door hai
Chaliye chod deta hoon.
1995-
Bhai Engineer sahab ka ghar kahan hai?
Aage ja kar left hand 2km par hai.
2005-
Bhai Engineer sahab ka ghar kahan hai?
Kaun se Engineer sahab?
Yahan toh bohat saare Engineer sahab hain..naam kya hai?
2015-
Bhai Engineer sahab ka ghar kahan hai?
Aage jakar kisi bhi ghar main ghus jao..
Koi na koi Engineer mil hi jaaye ga..
2025-
Bhai Engineer sahab ka ghar kahan ha?
Arrey pagal! Engineer ke paas ghar hota hai kya?...yahan pull ke neeche jitne bhi soye hain sab Engineer hain.
एक रिक्शा वाला
रिक्शे वाला:-
एक बार एक अमीर आदमी कहीं जा रहा होता है तो उसकी कार ख़राब हो जाती है। उसका कहीं पहुँचना बहुत जरुरी होता है। उसको दूर एक पेड़ के नीचे एक रिक्शा दिखाई देता है। वो उस रिक्शा वाले पास जाता है। वहा जाकर देखता है कि रिक्शा वाले ने अपने पैर हैंडल के ऊपर रखे होते है। पीठ उसकी अपनी सीट पर होती है और सिर जहा सवारी बैठती है उस सीट पर होती है ।
और वो मज़े से लेट कर गाना गुन-गुना रहा होता है। वो अमीर व्यक्ति रिक्शा वाले को ऐसे बैठे हुए देख कर बहुत हैरान होता है कि एक व्यक्ति ऐसे बेआराम जगह में कैसे रह सकता है, कैसे खुश रह सकता है। कैसे गुन-गुना सकता है।
वो उसको चलने के लिए बोलता है। रिक्शा वाला झट से उठता है और उसे 20 रूपए देने के लिए बोलता है।
रास्ते में वो रिक्शा वाला वही गाना गुन-गुनाते हुए मज़े से रिक्शा खींचता है।
वो अमीर व्यक्ति एक बार फिर हैरान कि एक व्यक्ति 20 रूपए लेकर इतना खुश कैसे हो सकता है। इतने मज़े से कैसे गुन-गुना सकता है। वो थोडा इर्ष्यापूर्ण हो जाता है और रिक्शा वाले को समझने के लिए उसको अपने बंगले में रात को खाने के लिए बुला लेता है। रिक्शा वाला उसके बुलावे को स्वीकार कर देता है।
वो अपने हर नौकर को बोल देता है कि इस रिक्शा वाले को सबसे अच्छे खाने की सुविधा दी जाए।
अलग अलग तरह के खाने की सेवा हो जाती है। सूप्स, आइस क्रीम, गुलाब जामुन सब्जियां यानि हर चीज वहाँ मौजूद थी।
वो रिक्शा वाला खाना शुरू कर देता है, कोई प्रतिक्रिया, कोई घबराहट बयान नहीं करता। बस वही गाना गुन-गुनाते हुए मजे से वो खाना खाता है। सभी लोगो को ऐसे लगता है जैसे रिक्शा वाला ऐसा खाना पहली बार नहीं खा रहा है। पहले भी कई बार खा चुका है। वो अमीर आदमी एक बार फिर हैरान एक बार फिर इर्ष्यापूर्ण कि कोई आम आदमी इतने ज्यादा तरह के व्यंजन देख के भी कोई हैरानी वाली प्रतिक्रिया क्यों नहीं देता और वैसे कैसे गुन-गुना रहा है जैसे रिक्शे में गुन-गुना रहा था।
यह सब कुछ देखकर अमीर आदमी की इर्ष्या और बढती है।
अब वह रिक्शे वाले को अपने बंगले में कुछ दिन रुकने के लिए बोलता है। रिक्शा वाला हाँ कर देता है।
उसको बहुत ज्यादा इज्जत दी जाती है। कोई उसको जूते पहना रहा होता है, तो कोई कोट ।
एक बेल बजाने से तीन-तीन नौकर सामने आ जाते है। एक बड़ी साइज़ की टेलीविज़न स्क्रीन पर उसको प्रोग्राम दिखाए जाते है। और एयर-कंडीशन कमरे में सोने के लिए बोला जाता है।
अमीर आदमी नोट करता है कि वो रिक्शा वाला इतना कुछ देख कर भी कुछ प्रतिक्रिया नहीं दे रहा। वो वैसे ही साधारण चल रहा है। जैसे वो रिक्शा में था वैसे ही है । वैसे ही गाना गुन-गुना रहा है जैसे वो रिक्शा में गुन-गुना रहा था।
अमीर आदमी के इर्ष्या बढ़ती चली जाती है और वह सोचता है कि अब तो हद ही हो गई । इसको तो कोई हैरानी नहीं हो रही, इसको कोई फरक ही नहीं पढ़ रहा। ये वैसे ही खुश है, कोई प्रतिक्रिया ही नहीं दे रहा।
अब अमीर आदमी पूछता है: आप खुश हैं ना?
वो रिक्शा वाला कहते है: जी साहेब बिलकुल खुश हूँ ।
अमीर आदमी फिर पूछता है: आप आराम में हैं ना ?
रिक्शा वाला कहता है: जी बिलकुल आरामदायक हूँ ।
अब अमीर आदमी तय करता है कि इसको उसी रिक्शा पर वापस छोड़ दिया जाये ।
वहाँ जाकर ही इसको इन बेहतरीन चीजो का एहसास होगा। क्योंकि वहाँ जाकर ये इन सब बेहतरीन चीजो को याद करेगा।
अमीर आदमी अपने सेक्रेटरी को बोलता है की इसको कह दो कि आपने दिखावे के लिए कह दिया कि आप खुश हो, आप आरामदायक हो। लेकिन साहब समझ गये है कि आप खुश नहीं हो आराम में नहीं हो। इसलिए आपको उसी रिक्शा के पास छोड़ दिया जाएगा।”
सेक्रेटरी के ऐसा कहने पर रिक्शा वाला कहता है: ठीक है सर, जैसे आप चाहे, जब आप चाहे।
उसे वापस उसी जगह पर छोड़ दिया जाता है जहाँ पर उसका रिक्शा था।
अब वो अमीर आदमी अपने गाड़ी के काले शीशे ऊँचे करके उसे देखता है।
रिक्शे वाले ने अपनी सीट उठाई बैग में से काला सा, गन्दा सा, मेला सा कपड़ा निकाला, रिक्शा को साफ़ किया, मज़े में बैठ गया और वही गाना गुन-गुनाने लगा।
अमीर आदमी अपने सेक्रेटरी से पूछता है: “कि चक्कर क्या है। इसको कोई फरक ही नहीं पड रहा इतनी आरामदायक वाली, इतनी बेहतरीन जिंदगी को ठुकरा के वापस इस कठिन जिंदगी में आना और फिर वैसे ही खुश होना, वैसे ही गुन-गुनाना।”
फिर वो सेक्रेटरी उस अमीर आदमी को कहता है: “सर यह एक कामयाब इन्सान की पहचान है । एक कामयाब इन्सान वर्तमान में जीता है, उसको मनोरंजन (Enjoy) करता है और बढ़िया जिंदगी की उम्मीद में अपना वर्तमान खराब नहीं करता ।
अगर उससे भी बढ़िया जिंदगी मिल गई तो उसे भी वेलकम करता है उसको भी मनोरंजन (enjoy) करता है उसे भी भोगता है और उस वर्तमान को भी ख़राब नहीं करता । और अगर जिंदगी में दुबारा कोई बुरा दिन देखना पड़े तो वो भी वो अपने वर्तमान में ही जीता है।
इसका अर्थ भी हम आप से ही है कि अगर हम भी अपने वर्तमान में जियें तो ज्यादा खुश् रह सकते हैं।
धन्यवाद।
Wednesday, 2 March 2016
It's time to change our thinking.
This is a beautiful one all of you please read it....
There is an ancient story....
A man who has gone out of his town comes back and finds that his house is on fire. It was one of the most beautiful houses in the town, and the man loved the house. Many people were ready to give double price for the house, but he had never agreed for any price, and now it is just burning before his eyes. And thousands of people have gathered, but nothing can be done.
The fire has spread so far that even if you try to put it out, nothing will be saved. So he becomes very sad. His son comes running, and whispers something in his ear: "Don't be worried. I sold it yesterday, and at a very good price ― three times.... The offer was so good I could not wait for you. Forgive me."
But the father said, "Good, if you have sold it for three times more than the original price of the house." Then the father is also a watcher, with other watchers.
Just a moment before he was not a watcher, he was identified. It is the same house, the same fire, everything is the same. but now he is not concerned. He is enjoying it just as everybody else is enjoying.
Then the second son comes running, and he says to the father, "What are you doing? You are smiling ― and the house is on fire?"
The father said, "Don't you know, your brother has sold it."
He said, "He had talked about selling it, but nothing has been settled yet, and the man is not going to purchase it now." Again, everything changes. Tears which had disappeared, have come back to the father's eyes, his smile is no more there, his heart is beating fast. But the watcher is gone.
He is again identified.
And then the third son comes, and he says, "That man is a man of his word. I have just come from him. He said, 'It doesn't matter whether the house is burned or not, it is mine. And I am going to pay the price that I have settled for. Neither you knew, nor I knew that the house would catch on fire.'" Again the father is a watcher. The identity is no more there.
Actually nothing is changing; just the idea that "I am the owner, I am identified somehow with the house," makes the whole difference. The next moment he feels, "I am not identified. Somebody else has purchased it,
I have nothing to do with it; let the house burn."
This simple methodology of watching the mind, that you have nothing to do with it....
Most of its thoughts are not yours but from your parents, your teachers, your friends, the books, the movies, the television, the newspapers. Just count how many thoughts are your own, and you will be surprised that not a single thought is your own. All are from other sources, all are borrowed ― either dumped by others on you, or. foolishly dumped by yourself upon yourself, but nothing is yours.
Caste / religion / country / relationships / work. Anything could be related.
Thanks
Sunday, 21 February 2016
Dedicated to Aman public school and all staff
मुझे नहीं पता कि आखिर मैंने गलती क्या कर दी है जो चंद मुट्ठी भर लोग जिन्हें खुद तमीज तक नहीं है, वो लगे हैं मुझे बदनाम करने में।
कोई कहता है कि मैंने धोखा दे दिया, कोई बोलता है कि पीठ में छुरा घोंप दिया और तो और अब तो चरित्र पर बात बनने लगी हैं।
यहां पर लिखने का कारण ये है कि जिसके बारे में वो बात कर रहे हैं उसे तो अभी पता तक नहीं है।
अगर मैं आज इतना गलत हो गया तो साल 2009 से आपके साथ क्या कर रहा था?
और तो और तुम सब अपना याद रखते हो लेकिन ये क्यों भूल गए की ताली एक हाथ से नहीं बजती। कुछ तो मैंने किया ही होगा अच्छा जो इतने सालों से साथ में था मैं।
मुझे अपना कोई गम नहीं है कि मैं बनूं या बिगड़ूं लेकिन इतना जरूर है कि अगर मैं अपनी मर्यादा भूला तो सही नहीं होगा।
नोट:- किसी व्यक्ति विशेष से मेरी लड़ाई नहीं है। और जिनसे है मैं उन सभी का नाम अपने blog में लिख दुंगा।
चेतावनी:- अगर थोडा सा भी कुछ इधर उधर हुआ तो तुम सब के सब जाओगे क्योंकि मैंने तो अपना note तैयार कर रखा है।
अगर जरा सा भी मुझे कुछ हुआ तो आप सभी उसके जिम्मेदार होंगे।
Thursday, 11 February 2016
मेरा एक निर्णय
अभी तो एक ठीक सा निर्णय ही लिया था मैंने कि सभी मेरे को कसूरवार ठहराने लगे। कहते हैं वो कि मैं ऐसा था या मैं वैसा था, इन सभी का मेरे ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ने।
शायद इसका कारण है कि मैंने कभी किसी से कोई उम्मीद नहीं की।
इतना कुछ जानने और समझने को मिला है कि शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। लेकिन बताया भी नहीं जा सकता क्योंकि सब बेकार का ही था।
मेरी मेहनत और मेरा बिस्वास मेरे साथ है।
आशा ही नहीं अपितु पूरा विश्वास कि अच्छा होगा।
श्री राधे।
निर्णय की बात आगे !!!!!!