NitiN Raj SHARMA

Friday, 27 September 2019

DEAR BETI

       
                पितृसत्ता में वंश परंपरा के बहुत मायने होते हैं, जिसकी वजह से पुत्र की कामना की जाती है. मैं इससे ऊपर उठ चुका हूँ और इस सोच की मुख़ालफ़त करता हूँ. मैं जब जब तुम्हें देखता हूँ तो वंश परंपरा के सारे लोभ से परे चला जाता हूँ और ख़ुद को निर्मल पाता हूँ. तुम ही मेरी वारिस हो और इसके अतिरिक्त कोई पहचान ढोने की जरुरत नहीं. तुम्हारी अपनी स्वतंत्र पहचान बने, यही कामना है. इन्सान अपने कर्म से जाना जाए और अपनी कीर्ति से सम्मानित हो न कि वंश परंपरा से. तुम एक स्वतंत्र इकाई हो, व्यक्ति हो. तुम स्त्री यो नि में पैदा हुई हो मगर तुम्हें स्त्री बनाए रखने के तमाम उपकरणों और साज़िशों का घोर विरोध करुंगा. तुम्हें कभी गैरबराबरी का शिकार न होना पड़े और स्त्री होने के कारण कमतरी का अहसास न होने पाए, इसका ख़याल रखूंगा.

             मैं चाहता हूँ कि तुम आर्थिक रुप से इतनी मज़बूत बनो कि किसी पर निर्भरता न रहे. संपत्ति का बँटवारा असमान है भारतीय समाज में. क़ानून तो बदल गया लेकिन समाज का बदलना बहुत आसान नहीं. एक सदी और लगे शायद. बहुत उम्मीद नहीं कि संपत्ति से पितृसत्ता का क़ब्ज़ा हटेगा. यह लडाई कुछ तुम्हें और कुछ मुझे लड़नी होगी. पहल मुझे करना है और आगे तुम्हें संभालना है. ख़ुद को गिल्ट से बचाए रखना भी जरुरी है .

            इसके पहले ख़ुद को आर्थिक मज़बूती देना जरुरी है . वह शिक्षा और सूझ से आती है. शिक्षा में भी पहले बहुत भेदभाव हुए. सब मैने देखा है...

            बदलते वक़्त के साथ यह भेद खत्म हो रहा है. हमारे दौर के पिताओं ने इस मामले में गैरबराबरी लगभग खत्म कर दी. तुम्हें भी समान अवसर मिलेगा और तुम आर्थिक ताक़त लेकर उभरो .

#dearbeti
#ANKUSH

#WRITTENBY

#UNCLEJI

संस्कार


           सन्तोष मिश्रा जी के यहाँ पहला लड़का हुआ तो पत्नी ने कहा, "बच्चे को गुरुकुल में शिक्षा दिलवाते है, मैं सोच रही हूँ कि गुरुकुल में शिक्षा देकर उसे धर्म ज्ञाता पंडित योगी बनाऊंगी।"
सन्तोष जी ने पत्नी से कहा, "पाण्डित्य पूर्ण योगी बना कर इसे भूखा मारना है क्या!! मैं इसे बड़ा अफसर बनाऊंगा ताकि दुनिया में एक कामयाबी वाला इंसान बने।।"
संतोष जी सरकारी बैंक में मैनेजर के पद पर थे! पत्नी धार्मिक थी और इच्छा थी कि बेटा पाण्डित्य पूर्ण योगी बने, लेकिन सन्तोष जी नहीं माने।
दूसरा लड़का हुआ पत्नी ने जिद की, सन्तोष जी इस बार भी ना माने, तीसरा लड़का हुआ पत्नी ने फिर जिद की, लेकिन सन्तोष जी एक ही रट लगाते रहे, "कहां से खाएगा, कैसे गुजारा करेगा, और नही माने।"
चौथा लड़का हुआ, इस बार पत्नी की जिद के आगे सन्तोष जी हार गए, और अंततः उन्होंने गुरुकुल में शिक्षा दीक्षा दिलवाने के लिए वही भेज ही दिया।
अब धीरे धीरे समय का चक्र घूमा, अब वो दिन आ गया जब बच्चे अपने पैरों पे मजबूती से खड़े हो गए, पहले तीनों लड़कों ने मेहनत करके सरकारी नौकरियां हासिल कर ली, पहला डॉक्टर, दूसरा बैंक मैनेजर, तीसरा एक गोवरमेंट कंपनी मेें जॉब करने लगा।
एक दिन की बात है सन्तोष जी  पत्नी से बोले, "अरे भाग्यवान! देखा, मेरे तीनो होनहार बेटे सरकारी पदों पे हो गए न, अच्छी कमाई भी कर रहे है, तीनो की जिंदगी तो अब सेट हो गयी, कोई चिंता नही रहेगी अब इन तीनो को। लेकिन अफसोस मेरा सबसे छोटा बेटा गुुुरुकुल का आचार्य बन कर घर घर यज्ञ करवा रहा है, प्रवचन कर रहा है! जितना वह छ: महीने में कमाएगा उतना मेरा एक बेटा एक महीने में कमा लेगा, अरे भाग्यवान! तुमने अपनी मर्जी करवा कर बड़ी गलती की, तुम्हे भी आज इस पर पश्चाताप होता होगा, मुझे मालूम है, लेकिन तुम बोलती नही हो"।
पत्नी ने कहा, "हम मे से कोई एक गलत है, और ये आज दूध का दूध पानी का पानी हो जाना चाहिए, चलो अब हम परीक्षा ले लेते है चारों की, कौन गलत है कौन सही पता चल जाएगा।।"
दूसरे दिन शाम के वक्त पत्नी ने बाल बिखरा, अपनी साड़ी का पल्लू फाड़ कर और चेहरे पर एक दो नाखून के निशान मार कर आंगन मे बैठ गई और पतिदेव को अंदर कमरे मे छिपा दिया ..!!
बड़ा बेटा आया पूछा, "मम्मी क्या हुआ?"
माँ ने जवाब दिया, "तुम्हारे पापा ने मारा है!"
पहला बेटा :- "बुड्ढा, सठिया गया है क्या ? कहां है ? बुलाओतो जरा।।"
माँ ने कहा, "नही है , बाहर गए है!"
पहला बेटा - "आए तो मुझे बुला लेना, मैं कमरे मे हूँ, मेरा खाना निकाल दो मुझे भूख लगी है!"
ये कहकर कमरे मे चला गया।
दूसरा बेटा आया पूछा तो माँ ने वही जवाब दिया,
दूसरा बेटा : "क्या पगला गए है इस बुढ़ापे मे, उनसे कहना चुपचाप अपनी बची खुची गुजार ले, आए तो मुझे बुला लेना और मैं खाना खाकर आया हूँ सोना है मुझे, अगर आये तो मुझे अभी मत जगाना, सुबह खबर लेता हूँ उनकी।।",
ये कह कर वो भी अपने कमरे मे चला गया।
तीसरा बेटा आया पूछा तो आगबबूला हो गया, "इस बुढ़ापे मे अपनी औलादो के हाथ से जूते खाने वाले काम कर रहे है! इसने तो मर्यादा की सारी हदें पार कर दीं।"
यह कर वह भी अपने कमरे मे चला गया।।
संतोष जी अंदर बैठे बैठे सारी बाते सुन रहे थे, ऐसा लग रहा था कि जैसे उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो, और उसके आंसू नही रुक रहे थे, किस तरह इन बच्चो के लिए दिन रात मेहनत करके पाला पोसा, उनको बड़ा आदमी बनाया, जिसकी तमाम गलतियों को मैंने नजरअंदाज करके आगे बढ़ाया! और ये ऐसा बर्ताव, अब तो बर्दाश्त ही नहीं हो रहा.....
इतने मे चौथा बेटा घर मे ओम् ओम् ओम् करते हुए अंदर आया।।
माँ को इस हाल मे देखा तो भागते हुए आया, पूछा, तो माँ ने अब गंदे गंदे शब्दो मे अपने पति को बुरा भला कहा तो चौथे बेटे ने माँ का हाथ पकड़ कर समझाया कि "माँ आप पिताजी की प्राण हो, वो आपके बिना अधूरे हैं,---अगर पिता जी ने आपको कुछ कह दिया तो क्या हुआ, मैंने पिता जी को आज तक आपसे बत्तमीजी से बात करते हुए नही देखा, वो आपसे हमेशा प्रेम से बाते करते थे, जिन्होंने इतनी सारी खुशिया दी, आज नाराजगी से पेश आए तो क्या हुआ, हो सकता है आज उनको किसी बात को लेकर चिंता रही हो, हो ना हो माँ ! आप से कही गलती जरूर हुई होगी, अरे माँ ! पिता जी आपका कितना ख्याल रखते है, याद है न आपको, छ: साल पहले जब आपका स्वास्थ्य ठीक नही था,  तो पिता जी ने कितने दिनों तक आपकी सेवा कीे थी, वही भोजन बनाते थे, घर का सारा काम करते थे, कपड़े धोते थे, तब आपने फोन करके मुझे सूचना दी थी कि मैं संसार की सबसे भाग्यशाली औरत हूँ, तुम्हारे पिता जी मेरा बहुत ख्याल करते हैं।"
इतना सुनते ही बेटे को गले लगाकर फफक फफक कर रोने लगी, सन्तोष जी आँखो मे आंसू लिए सामने खड़े थे।
"अब बताइये क्या कहेंगे आप मेरे फैसले पर", पत्नी ने संतोष जी से पूछा।
सन्तोष जी ने तुरन्त अपने बेटे को गले लगा लिया, !
सन्तोष जी की धर्मपत्नी ने कहा, "ये शिक्षा इंग्लिश मीडियम स्कूलो मे नही दी जाती। माँ-बाप से कैसे पेश आना है, कैसे उनकी सेवा करनी है। ये तो गुरुकुल ही सिखा सकते हैं जहाँ वेद गीता रामायण जैसे ग्रन्थ पढाये जाते हैैं संस्कार दिये जाते हैं।
अब सन्तोष जी को एहसास हुआ- जिन बच्चो पर लाखो खर्च करके डिग्रीया दिलाई वे सब जाली निकले, असल में ज्ञानी तो वो सब बच्चे है, जिन्होंने जमीन पर बैठ कर पढ़ा है, मैं कितना बड़ा नासमझ था, फिर दिल से एक आवाज निकलती है, काश मैंने चारो बेटो को गुरुकुल में शिक्षा दीक्षा दी होती।

मातृमान पितृमान आचार्यावान् पुरुषो वेद:।।


Friday, 30 August 2019

मैं दुविधा में हूँ कि

कलम इतनी जो घिसती आयी है
महिला के हुस्न पर
मैं दुविधा में हूँ कि
ये मर्द लिखते इतना अच्छा हैं
या हम वाकई में दिखते इतना अच्छा हैं
नजरिया हसीन है उनका
या मैं सचमुच चाँद की मूरत हूँ
मैं दुविधा में हूँ
प्यार करते हैं वो मुझसे
या मैं बस उनकी एक जरूरत हूँ
काले मेरे बालों की पनाहों में वो सो जाना चाहते हैं
घने बालों में मेरे वो खो जाना चाहते हैं
पर यही बाल अगर मैं हटवाऊं अपने हाथों पर से मैं
तो उस दिन के लिए बस ना जाने क्यूँ
वो मुझसे दूर हो जाना चाहते हैं
क्या आँखों में मेरी सचमुच समुद्र सी गहराई है
या दिखती इनमें उन्हें हर औरत की परछाई है
मैं दुविधा में हूँ
आखिर उनकी बातों में कितनी सच्चाई है
क्योंकि बखान तो उन्होंने कर दिया मेरे बदन का
पर मेरे संदर्श की स्वरूप की एक बात तक नहीं बताई है
(संदर्श, स्वरूप= personality and prosperity)
हथेलियों को मेरी नाजुक वो लिखते हैं
मैं दुविधा में हूँ कि
क्या इनसे किये प्रयास भी उन्हें दिखते हैं
क्या कुछ भी दिखता है
उन्हें मेरे जिस्म के अलावा
ये शायरी सब उनकी ईमानदार है
या है एक छलावा
सच है अगर तो भी
मैं दुविधा में हूँ
मेरे होठों की लाली तो उन्हें याद रहती है
पर यहीं से टप की बोली उनसे सब कह कर भी
क्यूँ कुछ नहीं कहती है
क्या मेरी आवाज ही सुनते हैं वो
या बातों पर भी ध्यान उनका जाता है
क्या मैं बनी बनाई पसंद हूँ उन्हें
या पसंद हूँ वैसी जैसा मैंने खुद को तराशा है
मेरे रूप को खूबसूरत वो कहते हैं
पर खूबसूरती की परिभाषा वो नहीं बताते हैं
शायद प्यार करते हैं वो सिर्फ इस चेहरे से
पर मैं तब भी दुविधा में हूँ
क्योंकि इसके पीछे छिपे दर्द तो उन्हें नजर नहीं आते हैं
मीठा फल भी एक समय के बाद सड़ जाता है
मैं दुविधा में हूँ कि
किस बात पर लिखेंगे वो
जब मेरा बुढ़ापा आता है
ए कलम से घायल करने वाले क्षत्रिय
यूँ तो शिकायत नहीं हूँ कभी करती
पर हुस्न को ना लिखकर गर हुनर को लिखते
तो शायद शायरी तुम्हारी
घायल मुझे भी करती
फिर मेरे चले जाने के गम से
मुशायरों में तालियां नहीं बजती
बल्कि मेरे साथ बिताये हसीन
लम्हों की मुस्कराहट
हर महफ़िल में सबके लबों पर सजती

#Dedicated
#khushboo
#alwaysproud
#NITINRAJSHARMA

Tuesday, 9 July 2019

कहाँ छुपी हैं शक्तियां!

               एक बार देवताओं में चर्चा हो रहो थी, चर्चा का विषय था मनुष्य की हर मनोकामनाओं को पूरा करने वाली गुप्त चमत्कारी शक्तियों को कहाँ छुपाया जाये। सभी देवताओं में इस पर बहुत वाद- विवाद हुआ। एक देवता ने अपना मत रखा और कहा कि इसे हम एक जंगल की गुफा में रख देते हैं। दूसरे देवता ने उसे टोकते हुए कहा नहीं- नहीं हम इसे पर्वत की चोटी पर छिपा देंगे। उस देवता की बात ठीक पूरी भी नहीं हुई थी कि कोई कहने लगा, न तो हम इसे कहीं गुफा में छिपाएंगे और न ही इसे पर्वत की चोटी पर हम इसे समुद्र की गहराइयों में छिपा देते हैं यही स्थान इसके लिए सबसे उपयुक्त रहेगा।

               सबकी राय खत्म हो जाने के बाद एक बुद्धिमान देवता ने कहा क्यों न हम मानव की चमत्कारिक शक्तियों को मानव -मन की गहराइयों में छिपा दें। चूँकि बचपन से ही उसका मन इधर -उधर दौड़ता रहता है, मनुष्य कभी कल्पना भी नहीं कर सकेगा कि ऐसी अदभुत और विलक्षण शक्तियां उसके भीतर छिपी हो सकती हैं। और वह इन्हें बाह्य जगत में खोजता रहेगा अतः इन बहुमूल्य शक्तियों को हम उसके मन की निचली तह में छिपा देंगे। बाकी सभी देवता भी इस प्रस्ताव पर सहमत हो गए। और ऐसा ही किया गया, मनुष्य के भीतर ही चमत्कारी शक्तियों का भण्डार छुपा दिया गया, इसलिए कहा जाता है मानव मवन में अद्भुत शक्तियां निहित हैं।

                 दोस्तों इस कहानी का सार यह है कि मानव मन असीम ऊर्जा का कोष है। इंसान जो भी चाहे वो हासिल कर सकता है। मनुष्य के लिए कुछ भी असाध्य नहीं है। लेकिन बड़े दुःख की बात है उसे स्वयं ही विश्वास नहीं होता कि उसके भीतर इतनी शक्तियां विद्यमान हैं। अपने अंदर की शक्तियों को पहचानिये, उन्हें पर्वत, गुफा या समुद्र में मत ढूंढिए बल्कि अपने अंदर खोजिए और अपनी शक्तियों को निखारिए। हथेलियों से अपनी आँखों को ढंककर अंधकार होने का शिकायत मत कीजिये। आँखें खोलिए, अपने भीतर झांकिए और अपनी अपार शक्तियों का प्रयोग कर अपना हर एक सपना पूरा कर डालिये।

#KHUSHBOO

Wednesday, 26 June 2019

#KABIRSINGH - An Ugly truth of society

'कबीर सिंह' को देखकर क्यों तालियां पीट रहे हैं लोग:

फ़िल्म 'कबीर सिंह' प्यार की कहानी नहीं है. ये एक आदमी के पागलपन की कहानी है. कबीर सिंह का पागलपन घिनौना है. और फ़िल्म उसी घिनौने शख़्स को हीरो बना देती है.


वो आदमी जिसे जब अपना प्यार नहीं मिलता तो वो किसी भी राह चलती लड़की से बिना जान पहचान शारीरिक संबंध बनाना चाहता है.

यहां तक कि एक लड़की मना करे तो चाक़ू की नोक पर उससे कपड़े उतारने को कहता है.

वो इससे पहले अपनी प्रेमिका से साढ़े चार सौ बार सेक्स कर चुका है और अब जब वो नहीं है तो अपनी गर्मी को शांत करने के लिए सरेआम अपनी पतलून में बर्फ़ डालता है.

और मर्दानगी की इस नुमाइश पर सिनेमा हॉल में हंसी-ठिठोली होती है.

तेलुगू फ़िल्म 'अर्जुन रेड्डी' पर आधारित ये फ़िल्म उस प्रेमी की कहानी है जिसकी प्रेमिका का परिवार उनके रिश्ते के ख़िलाफ़ है और प्रेमिका की शादी ज़बरदस्ती किसी और लड़के से करा देता है.

जंगलीपन की शक्ल लेता विलाप

इसके बाद प्रेमी कबीर सिंह का विलाप जंगलीपन की शक्ल ले लेता है. क्योंकि वो किरदार शुरू से ही औरत को अपनी जागीर मानने वाला और 'वो मेरी नहीं तो किसी और की भी नहीं होगी' वाली मानसिकता वाला है.

प्रेमिका हर व़क्त शलवार क़मीज़ और दुपट्टा लिए रहती है पर वो उसे गला ढकने को कहता है.

वो 'उसकी' है ये साफ़ करने के लिए पूरे कॉलेज को धमकाता है. होली के त्यौहार पर सबसे पहले वो ही उसे रंग लगाए इसके लिए लंबा-चौड़ा इंतज़ाम करता है.

उसे ये तक कहता है कि उसका कोई वजूद नहीं और "कॉलेज में लोग उसे सिर्फ़ इसलिए जानते हैं क्योंकि वो कबीर सिंह की बंदी है".

खुले तौर पर शराब पीने, सिगरेट का धुंआ उड़ाने और दिल्ली जैसे 'अनऑर्थोडोक्स' यानी खुले विचारों वाले शहर में शादी से पहले आम तौर पर सेक्स करने का माहौल, ये सब छलावा है.

इस फ़िल्म में कुछ भी प्रगतिशील, खुला, नई सोच जैसा नहीं है. इस फ़िल्म का हीरो अपनी प्रेमिका को हर तरीक़े से अपने बस में करना चाहता है और पसंद की बात ना होने पर ग़ुस्सैल स्वभाव की आड़ में जंगलीपन पर उतर आता है.

सभ्य समाज का दबंग

उसके पिता से बद्तमीज़ी करता है, अपने दोस्तों और उनके काम को नीचा दिखाता है, अपने कॉलेज के डीन का अपमान करता है, अपनी दादी पर चिल्लाता है और अपने घर में काम करनेवाली बाई के एक कांच का गिलास ग़लती से तोड़ देने पर उसे चार मंज़िलों की सीड़ियों पर दौड़ाता है.

दरअसल कबीर सिंह सभ्य समाज का दबंग है. बिना लाग-लपेट कहें, तो ये किरदार एक गुंडा है.

प्यार पाने की ज़िद और ना मिलने की चोट, दोनों महज़ बहाने हैं. इस किरदार की हरकतों को जायज़ ठहराने के. उसे हीरो बनाने के.

हिन्दी फ़िल्म के हीरो को सात ख़ून माफ़ होते हैं. उस किरदार की ख़ामियों को ऐसे पेश किया जाता है कि देखनेवालों की नज़र में वो मजबूरी में की गईं ग़लतियां लगें.

कबीर सिंह का बेहिसाब ग़ुस्सा हो, बदज़बानी हो या अपनी प्रेमिका के साथ बदसलूकी, उसके दोस्त, उसका परिवार, उसके साथ काम करनेवाले, उसके कॉलेज के डीन और उसकी प्रेमिका तक, सब उसे माफ़ कर देते हैं. तो देखनेवाले क्यों ना माफ़ करें?

दशकों से औरत को नियंत्रण में रखनेवाले मर्दाना किरदार पसंद किए गए हैं. ऐसी फ़िल्में करोड़ों कमाती आईं हैं. और सोच से परे दकियानूसी ख्यालों को जायज़ ठहराती रही हैं.

कबीर सिंह शराबी हो जाता है पर उसके दोस्त उसका साथ नहीं छोड़ते बल्कि एक दोस्त तो उसे अपनी बहन से शादी का प्रस्ताव भी देता है.

"मेरी बहन तेरे बारे में सब जानती है पर फिर भी तुझे बहुत पसंद करती है, तू उससे शादी करेगा?"

एक औरत के दिए ग़म से निकलने के लिए एक दूसरी औरत का बलिदान.

ज़िम्मेदार ठहराई जाए प्रेमिका

एक शराबी बदतमीज़ आदमी जो प्यार की चोट को वजह बनाकर किसी भी लड़की के साथ सोता है, ऐसे आदमी को पसंद करनेवाली बहन.

एक बार फिर एक फ़िल्म प्यार के नाम पर हिंसा का जश्न मना रही है. सिनेमा हॉल में ख़ूब तालियां बज रही हैं. सीटियों से हीरो का इस्तक़बाल हो रहा है.

पर लड़कियों को कैसे लड़के पसंद होते हैं? ऐसे तो नहीं. फ़िल्म की काल्पनिक दुनिया में भी ऐसा आदमी मेरा हीरो नहीं हो सकता.

जो मुझसे प्यार करे पर मेरे वजूद को नकार दे, मुझे हर व़क्त कंट्रोल करने की कोशिश करे, जिसे ना मेरे नज़रिए की समझ हो ना ही परवाह.

फिर मैं ना मिलूं तो किताब में लिखी हर घृणित हरकत करे. और फ़िल्म में बार-बार उन सभी हरकतों के लिए उसे नहीं, उसकी प्रेमिका को ज़िम्मेदार ठहराया जाए.

सारी परेशानियों की जड़ उसे बना दिया जाए. कबीर सिंह का ग़ुस्सा, शराब के प्रति दीवानापन, मरने की कोशिशें, इस सब की क़सूरवार वो प्रेमिका बना दी जाए.

उस प्रेमिका की ज़िंदगी, उसका अकेलापन, इसकी कोई चर्चा ना हो. और आख़िरी सीन में वो अचानक कबीर सिंह को हर बात के लिए माफ़ कर दे और वो हीरो बन जाए.

प्यार जैसे ख़ूबसूरत रिश्ते जिसमें हिंसा को किसी भी पैमाने से सही नहीं ठहराया जा सकता और जिसमें बराबरी और आत्म सम्मान की लड़ाई औरतें दशकों से लड़ रही हैं, उसके बारे में सोच कैसे खुलेगी?

आप ही से शुरुआत होगी. बॉक्स ऑफ़िस पर सफलता के शोर के बीच मैं लिखूंगी, आप पढ़ेंगे और इस जश्न को बारीकी से समझकर नकारने की गुंजाइश बनी रहेगी.

Khushboo

An aspiring reporter

Friday, 7 June 2019

Her post (an emotional one)

I promised myself that I will score 95+ in my twelfth class.But in actual,I even didn't scored 85+. What just happened was,I scored above than 80.And this is what matters.

What I want from now is,I have to score 1st rank in upse exam.And one thing more, it can't be compare with twelfth class.Its different from that.It needs my dedication,a highly creative,and working mind.It will also need my consistency towards study.

I am sure I can do it.Because I am made for that.Yes of course,I am only made for that. I don't know what I will do without it.UPSE is now everything for me.

It's the love of my life now.You know n how I love.What is my way of loving someone or something. I just feel mad about them.Now it's easy for me to judge,do I really have love for UPSE,or not.
If I showed the same madness, affection, honesty with it,than I will be sure that.....







This the true love of my life.Do you know what is the best part of it,a very very best part....
If once I met him,he will never leave me back.I just need that one meeting with him.

But it's little tough to meet him and make him mine.

You know what, our love will never get defame.It will have respect,a lot of respect for me in eyes of everyone just because of him.And this is what I wanted in all my life.

A true lover,who deserve my madness,who love me more than I do,who respect me more than I had.

What I needed,you just gave me god.
Now I on mission ...

In search of

THE LOVE OF MY LIFE

By
MAHIMA YADAV
Akka
KHUSHBOO

Wednesday, 27 March 2019

संघर्ष करिये और सिखाइये


बाज पक्षी जिसे हम ईगल या शाहीन भी कहते है। जिस उम्र में बाकी परिंदों के बच्चे चिचियाना सीखते है उस उम्र में एक मादा बाज अपने चूजे को पंजे में दबोच कर सबसे ऊंचा उड़ जाती है। पक्षियों की दुनिया में ऐसी Tough and tight training किसी भी ओर की नही होती।


मादा बाज अपने चूजे को लेकर लगभग 12 Km ऊपर ले जाती है। जितने ऊपर अमूमन जहाज उड़ा करते हैं और वह दूरी तय करने में मादा बाज 7 से 9 मिनट का समय लेती है।

यहां से शुरू होती है उस नन्हें चूजे की कठिन परीक्षा। 

उसे अब यहां बताया जाएगा कि तू किस लिए पैदा हुआ है? 

तेरी दुनिया क्या है? 

तेरी ऊंचाई क्या है? 

तेरा धर्म बहुत ऊंचा है 

और फिर मादा बाज उसे अपने पंजों से छोड़ देती है।

धरती की ओर ऊपर से नीचे आते वक्त लगभग 1 Km उस चूजे को आभास ही नहीं होता कि उसके साथ क्या हो रहा है। 

6 Km के अंतराल के आने के बाद उस चूजे के पंख जो कंजाइन से जकड़े होते है, वह खुलने लगते है।

लगभग 8 Km आने के बाद उनके पंख पूरे खुल जाते है। यह जीवन का पहला दौर होता है जब बाज का बच्चा पंख फड़फड़ाता है।

अब धरती से वह लगभग 1000 मीटर दूर है ,लेकिन अभी वह उड़ना नहीं सीख पाया है। अब धरती के बिल्कुल करीब आता है जहां से वह देख सकता है उसके स्वामित्व को।

अब उसकी दूरी धरती से महज 700/800 मीटर होती है लेकिन उसका पंख अभी इतना मजबूत नहीं हुआ है की वो उड़ सके। 

धरती से लगभग 400/500 मीटर दूरी पर उसे अब लगता है कि उसके जीवन की शायद अंतिम यात्रा है। फिर अचानक से एक पंजा उसे आकर अपनी गिरफ्त मे लेता है और अपने पंखों के दरमियान समा लेता है। 
यह पंजा उसकी मां का होता है जो ठीक उसके उपर चिपक कर उड़ रही होती है और उसकी यह ट्रेनिंग निरंतर चलती रहती है जब तक कि वह उड़ना नहीं सीख जाता।

यह ट्रेनिंग एक कमांडो की तरह होती है। तब जाकर दुनिया को एक बाज़ मिलता है अपने से दस गुना अधिक वजनी प्राणी का भी शिकार करता है।

हिंदी में एक कहावत है... "बाज़ के बच्चे मुँडेर पर नही उड़ते।"

बेशक अपने बच्चों को अपने से चिपका कर रखिए पर... उसे दुनियां की मुश्किलों से रूबरू कराइए, उन्हें लड़ना सिखाइए। बिना आवश्यकता के भी संघर्ष करना सिखाइए। 

अपने बच्चे को राष्ट्र व धर्म की रक्षा के लिए सदैव तैयार रहना.. सिखाईये .. आसान रास्तों के लिए गद्दार मुंडेरो पर नहीं .. देशभक्ति का संकल्प लेकर एक अनन्त  ऊंचाई तक ले जायें ...

ये TV के रियलिटी शो और अंग्रेजी स्कूल की बसों ने मिलकर आपके बच्चों को "ब्रायलर मुर्गे" जैसा बना दिया है जिसके पास मजबूत टंगड़ी तो है पर चल नही सकता। वजनदार पंख तो है पर उड़ नही सकता क्योंकि...

"गमले के पौधे और जंगल के पौधे में बहुत फ़र्क होता है।"

NITIN

Wednesday, 23 January 2019

वायुमंडल की विभिन्न परतें

1-क्षोभमण्डल
►यह मण्डल जैव मण्डलीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि मौसम संबंधी सारी घटनाएं इसी में घटित होती हैं। 
►प्रति 165 मीटर की ऊंचाई पर वायु का तापमान 1 डिग्री सेल्सियस की औसत दर से घटता है। इसे सामान्य ताप पतन दर कहते है।
►इस मण्डल की सीमा विषुवत वृत्त के ऊपर 18 किमी की ऊंचाई तक तथा ध्रवों के ऊपर लगभग 8 किमी तक है।

2-समतापमण्डल
►इसकी मोटाई 50 किमी से 55 किमी तक है।
►इस मण्डल में तापमान स्थिर रहता है तथा इसके बाद ऊंचाई के साथ बढ़ता जाता है।
►समताप मण्डल बादल तथा मौसम संबंधी घटनाओं से मुक्त रहता है।
►इस मण्डल के निचले भाग में जेट वायुयान के उड़ान भरने के लिए आदर्श दशाएं हैं।
►इसकी ऊपरी सीमा को 'स्ट्रैटोपाज' कहते हैं।
►इस मण्डल के निचले भाग में ओज़ोन गैस बहुतायात में पायी जाती है। इस ओज़ोन बहुल मण्डल को ओज़ोन मण्डल कहते हैं।
►ओज़ोन गैस सौर्यिक विकिरण की हानिकारक पराबैंगनी किरणों को सोख लेती है और उन्हें भूतल तक नहीं पहुंचने देती है तथा पृथ्वी को अधिक गर्म होने से बचाती हैं।

3-मध्यमण्डल
►इसका विस्तार 50-55 किमी से 80 किमी तक है।
►इस मण्डल में तापमान ऊंचाई के साथ घटता जाता है तथा मध्यमण्डल की ऊपरी सीमा मेसोपाज पर तापमान 80 डिग्री सेल्सियस बताया जाता है।

4-आयन मण्डल
►इस मण्डल में ऊंचाई के साथ ताप में तेजी से वृद्धि होती है।
►आयन मण्डल, तापमण्डल का निचला भाग है जिसमें विद्युत आवेशित कण होते हैं जिन्हें आयन कहते हैं।
►ये कण रेडियो तरंगों को भूपृष्ठ पर परावर्तित करते हैं और बेतार संचार को संभव बनाते हैं।

5-बाह्यमण्डल
►इसे वायुमण्डल का सीमांत क्षेत्र कहा जाता है। इस मण्डल की वायु अत्यंत विरल होती है।