NitiN Raj SHARMA

Tuesday, 15 May 2018

सच्चा सुधार



    मनुष्य में अपूर्णता और त्रुटियाँ भरी हुई हैं, इससे अज्ञानवश बहुत से पाप होते रहते हैं। समय आने पर जिनके लिए वह स्वयं पश्चाताप करता है और सुधार के मार्ग पर चल खड़ा होता है। इसलिए किसी व्यक्ति का सच्चा दोष देखने पर भी हमें चाहियें, कि हम उसके प्रति घृणा द्वेष, क्रोध अथवा और किसी प्रकार का अपमान पूर्वक बर्ताव न करें अर्थात् सख्ती से सुधार की चेष्टा न करे। 

  बहुत बार हमारे क्रोध और अपमान को दोषी व्यक्ति सह लेता है। क्योंकि पाप के भय से वह भयभीत होता है। उसकी दूषित वृत्ति कुछ समय के लिए दब जाती है, परन्तु सर्वदा के लिए उसका नाश नहीं होता। हमारे द्वारा किये गये अपमान का बदला लेना उसके मन में खटकता रहता है, जो उसकी दोषाग्नी में घृत जैसा काम करता है। 

  हमारे लिए उसकी दोष पूर्ण चेष्टा होने शुरू हो जाती है, जो काम, क्रोध और हिंसा की वृत्तियाँ को जगा कर हमारे पतन का कारण होती है, यदि किसी का सच्चा सुधार करना हो तो उसके दोषों को जड़ से उखाड़ना चाहियें। 

  प्रेम, सेवा, स्वार्थ त्याग, द्वारा उसके मन पर अधिकार करना चाहियें क्योंकि मन ही अच्छी बुरी वृत्तियों का स्थान है। परन्तु इस प्रकार दोषों को दूर करने के लिए असीम स्वार्थ त्याग और आत्म विश्वास की आवश्यकता है।

धन्यवाद



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