NitiN Raj SHARMA

Thursday, 25 May 2017

नारी उत्थान समस्या और समाधान

नारी के अंतर्मन में आत्महीनता की ग्रंथि पीढ़ियों से जम गई है, वह स्वयं अपने को हीन, असमर्थ, दीन- दुर्बल, पराधीन, दुर्भाग्य की मारी हुई मान बैठी है ।। इस मान्यता के रहते न कोई बड़ा सुधार हो सकेगा और न बड़ा परिवर्तन ।। स्थिति बदलने के लिए बाहर से थोपे गए उपाय उतने कारगर नहीं हो सकते जितने कि पीडित पक्ष के तनकर खड़े हो जाने पर संभव होता है, इसलिए न केवलं शिक्षा की वरन उत्कर्ष का इस स्तर तक उभार होना चाहिए कि उसे चरण दासी बने रहने की स्थिति स्वीकार नहीं वरन् वह पुरुष पर शासन करने की स्थिति तक पहुँचकर रहेगी और दबाव से नहीं वरन् स्वेच्छा से उसे सद्भाव भरा सहयोग प्रदान करेगी ।। माता के रूप में वह संतान का पोषण भी करती है और मार्गदर्शन भी ।। पत्नी के रूप में वह पति को सघन आत्मीयता का अमृत भी पिलाती है, साथ ही उच्छृंखलता न बरतने वाला अंकुश भी लगाती है ।। भगिनी और पुत्री दबाव तो उतना नहीं दे पाती, पर अपने भाव भरे संवेदन द्वारा भाई या पिता को मर्यादा में रहने के लिए प्रकारांतर से बाधित अवश्य करती है ।। यह शाश्वत समर्थता अब तक इन दिनों प्रयुक्त हो नहीं पा रही है, अब उसे अपनी सत्ता और महत्ता का आत्मबोध स्वयं प्राप्त करना है साथ ही यह भी सोचना है कि अब की अपेक्षा भविष्य में किस प्रकार अच्छी स्थिति तक पहुँचना संभव हो सकता है- यह चिंतन हर किसी पिछड़ी स्थिति वाले के मन में उठना चाहिए, भले ही उसे असंतोष भड़कना ही क्यों न कहा जाए ।। यह हर मनुष्य का ईश्वर प्रदत्त अधिकार है कि वह अपने उज्ज्वल भविष्य की कल्पना और चेष्टा करे ।। यह मानसिकता हर किसी की रहनी चाहिए अन्यथा प्रगति का पथ ही रुक जाएगा ।।
Table of content
1. नारी उत्कर्ष के लिए कौन आगे आये
2. नारी प्रगति का शुभारंभ कहाँ से हो
3. प्रथम चरण: शिक्षा का संवर्धन
4. शिक्षा संवर्धन की पृष्ठभूमि
5. नारी शिक्षा का गतिचक्र इस प्रकार घूमें
6. अभ्युदय की आकांक्षा जग पड़े
7. कुरीति निवारण का मोर्चा
8. सामूहिकता के माध्यम से उत्साह का उभार
9. व्यापक प्रयत्नों की आवश्यकता
10. मूलभूत समस्या और उसका सही समाधान

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